एक समय था जब मार्च का महीना बिहार के छात्रों और अभिभावकों के लिए भारी अनिश्चितता लेकर आता था। साल 2016 के बहुचर्चित टॉपर विवाद ने पूरे राज्य की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे और उस वक्त उत्तर पुस्तिकाओं की सुरक्षा पूरी तरह से सवालों के घेरे में थी। आज स्थिति इसके ठीक उलट है। अब बोर्ड ने पूरी व्यवस्था को डिजिटल रूप देकर देश के अन्य सभी बड़े शिक्षा बोर्ड को पीछे छोड़ दिया है।
हर साल 16 लाख से अधिक छात्र मैट्रिक की परीक्षा देते हैं और लगभग एक करोड़ कॉपियों का अंबार लग जाता है। इतनी बड़ी संख्या में उत्तर पुस्तिकाओं का प्रबंधन कोई आसान काम नहीं है। वर्तमान अध्यक्ष आनंद किशोर के नेतृत्व में बोर्ड ने पूरी मूल्यांकन प्रक्रिया का कायाकल्प कर दिया है। लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है। एक तरफ जहां समय पर नतीजे आना राहत की बात है, वहीं दूसरी तरफ इस अभूतपूर्व गति ने कुछ ऐसे बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं जिन पर कोई चर्चा नहीं करना चाहता।
एक दशक के भीतर देश के सबसे बदनाम बोर्ड का चौंकाने वाला कायाकल्प
आज मैट्रिक की लाखों कॉपियों की जांच के लिए बारकोडिंग तकनीक का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है। मूल्यांकन केंद्रों पर शिक्षकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे अंकों की फीडिंग के लिए केवल कंप्यूटर आधारित सिस्टम का ही उपयोग करें। इस एक तकनीकी बदलाव ने डेटा संकलन में लगने वाले समय को हफ्तों से घटाकर कुछ घंटों तक सीमित कर दिया है।
व्यवस्था में आए इस तकनीकी दखल ने पूरी तरह से नकल माफिया की कमर तोड़ दी है। सीसीटीवी की चौबीसों घंटे निगरानी और त्रिस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था ने यह सुनिश्चित किया है कि कोई भी बाहरी व्यक्ति मूल्यांकन केंद्रों तक न पहुंच सके। यह प्रशासनिक स्तर पर एक बहुत बड़ी जीत है। शिक्षकों के लिए भी अब कॉपियों का बंडल घर ले जाने की पुरानी परिपाटी पूरी तरह खत्म हो चुकी है।
इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। पहले कॉपियों की जांच से लेकर मार्कशीट छपने तक कई हाथों से डेटा गुजरता था जिससे हेरफेर की गुंजाइश बनी रहती थी। अब बारकोड स्कैन होते ही अंक सीधे केंद्रीय सर्वर में दर्ज हो जाते हैं। मगर यह सिर्फ सतह है। बोर्ड की इस ऐतिहासिक रफ्तार के पीछे एक ऐसी हकीकत छिपी है जो सीधे तौर पर छात्रों की बौद्धिक क्षमता के साथ खिलवाड़ कर रही है।
रफ्तार बनाम गुणवत्ता की इस नई प्रशासनिक दौड़ में कौन हार रहा है
बोर्ड का मुख्य फोकस अब किसी भी तरह मार्च के अंत तक हर हाल में नतीजे घोषित करने पर टिक गया है। महज बीस दिनों के भीतर एक करोड़ कॉपियों को जांचना एक अत्यंत जटिल चुनौती है। इस समय-सीमा को पूरा करने के लिए मूल्यांकनकर्ताओं पर प्रतिदिन अधिकतम कॉपियां जांचने का भारी मनोवैज्ञानिक दबाव बना रहता है।
शिक्षा क्षेत्र के कई अनुभवी विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि इतनी तेजी से मूल्यांकन करने पर हर उत्तर के साथ न्याय करना मानवीय रूप से असंभव है। जब एक शिक्षक को दिन भर में साठ से सत्तर कॉपियां जांचनी होती हैं तो मूल्यांकन का स्तर बहुत सतही हो जाता है। ऐसे में छात्र की मौलिक सोच और रचनात्मकता के बजाय केवल रटे-रटाए किताबी शब्दों को खोजने की प्रवृत्ति हावी हो जाती है।
इस पूरी प्रणाली का सबसे बड़ा नुकसान उन ग्रामीण और रचनात्मक छात्रों को उठाना पड़ता है जो अपने शब्दों में उत्तर लिखते हैं। तेज जांच प्रक्रिया में परीक्षक अक्सर मार्किंग स्कीम में दिए गए मुख्य बिंदुओं को ही तलाशते हैं। अगर वे विशेष शब्द नहीं मिलते तो परीक्षक छात्र को औसत अंक देकर आगे बढ़ जाने में ही अपनी भलाई समझता है।
परीक्षकों को प्रति कॉपी जांचने के एवज में एक तय राशि का भुगतान किया जाता है जो उन्हें जल्दबाजी के लिए प्रेरित करता है। यह आर्थिक प्रोत्साहन पूरी अकादमिक प्रक्रिया को एक लक्ष्य आधारित औद्योगिक उत्पादन की तरह बदल देता है। बोर्ड को समय पर परिणाम देने के लिए देशभर में वाहवाही तो मिल जाती है लेकिन शिक्षा और आकलन की मूल भावना इस शोर में कहीं पीछे छूट जाती है।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड जैसी संस्थाएं आज भी मूल्यांकन में अधिक समय लेना पसंद करती हैं क्योंकि वहां बहुस्तरीय जांच को प्राथमिकता दी जाती है। बिहार ने रफ्तार के मामले में भले ही राष्ट्रीय स्तर पर बाजी मार ली हो लेकिन यह तेजी छात्रों के वास्तविक ज्ञान का सही पैमाना पेश नहीं कर रही है। यह महज एक प्रशासनिक आंकड़ा बनकर रह गई है।
डिजिटल मूल्यांकन का अगला चरण तय करेगा बिहार की शिक्षा का भविष्य
आने वाले कुछ वर्षों में यह पूरी संभावना है कि बोर्ड वस्तुनिष्ठ प्रश्नों की तरह ही व्यक्तिपरक उत्तरों की जांच के लिए भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सहारा लेना शुरू कर दे। अगर ऐसा होता है तो कॉपियों की जांच में लगने वाला समय और भी कम हो जाएगा। हालांकि यह उन्नत तकनीक भाषाई बारीकियों और मानवीय संवेदनाओं को समझने में पूरी तरह विफल साबित हो सकती है।
दूसरा परिदृश्य यह उभरता है कि शिक्षा विभाग रफ्तार के साथ-साथ गुणवत्ता नियंत्रण के लिए एक स्वतंत्र ऑडिट तंत्र विकसित करे। इसमें यादृच्छिक रूप से चुनी गई कॉपियों की दोबारा गहराई से जांच की जा सकती है ताकि परीक्षकों की जवाबदेही तय की जा सके। इस सख्त कदम से व्यवस्था में एक बहुत ही जरूरी और स्थायी संतुलन स्थापित होने की उम्मीद बंधती है।
तीसरी और सबसे चुनौतीपूर्ण स्थिति तब पैदा होगी जब उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के दौरान इन अंकों की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगेंगे। अगर बड़े विश्वविद्यालयों को यह महसूस हुआ कि त्वरित मूल्यांकन से आए अंक छात्रों की वास्तविक प्रतिभा को नहीं दर्शाते हैं तो वे बोर्ड के अंकों को दरकिनार कर अपनी अलग प्रवेश परीक्षाएं थोप सकते हैं। ऐसी स्थिति में बोर्ड द्वारा हासिल की गई यह पूरी प्रशासनिक जीत अर्थहीन हो जाएगी।
रिकॉर्ड बुक में दर्ज सफलता और कक्षा के भीतर की खामोश सच्चाई
कॉपियों की जांच को एक मेगा इवेंट की तरह पेश करना सरकार और प्रशासन के लिए एक बड़ी उपलब्धि लग सकती है। बिहार ने पिछले कुछ सालों में जो तकनीकी और ढांचागत सुधार किया है वह निश्चित रूप से कई अन्य राज्यों के लिए एक केस स्टडी बन चुका है। समय पर नतीजे आने से छात्रों को आगे के दाखिले में काफी सुविधा होती है और उनका एक कीमती शैक्षणिक वर्ष बर्बाद होने से बच जाता है।
सफलता की इस चमकदार तस्वीर के पीछे का सच यह है कि ज्ञान का आकलन कभी भी मशीन की तरह काम नहीं कर सकता। जब एक छात्र साल भर की अपनी कड़ी मेहनत को पन्नों पर उतारता है तो वह केवल अंक नहीं बल्कि अपने ज्ञान का निष्पक्ष सम्मान मांगता है। रफ्तार को ही अंतिम लक्ष्य मान लेने वाली यह व्यवस्था जब तक एक-एक उत्तर की गरिमा को नहीं समझेगी तब तक असली शैक्षणिक क्रांति सिर्फ कागजों तक ही सीमित रहेगी।





















