ट्रंप की होर्मुज स्ट्रेट नाकेबंदी से भारत की ऊर्जा दुविधा बढ़ेगी, अमेरिकी कदमों का चीन पर असर समझिए

अमेरिकी सेना ने 13 अप्रैल को सुबह 10 बजे (भारतीय समयानुसार शाम 7:30 बजे) से होर्मुज स्ट्रेट में सभी देशों के जहाजों पर पूर्ण नाकेबंदी लागू कर दी। यह उपाय ईरान के बंदरगाहों को लक्षित करता है और भारत व चीन दोनों की तेल आयात आपूर्ति पर गंभीर प्रभाव डाल सकता है, विशेषज्ञों का मानना है।

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होर्मुज स्ट्रेट नाकेबंदी की विस्तृत घोषणा

वॉशिंगटन/तेहरान रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने सोमवार 13 अप्रैल को इरानी बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही पर पूरी रोक लगाने की सूचना जारी की। इस नाकेबंदी का दायरा अरब खाड़ी और ओमान की खाड़ी दोनों तक विस्तृत है, और यह सभी देशों के जहाजों पर बिना किसी भेदभाव के लागू होगी। अमेरिकी रक्षा विभाग ने स्पष्ट किया कि यह कदम केवल ईरान‑संबंधित ट्रांसिट को लक्षित करेगा, लेकिन प्रभावी तौर पर इस जलमार्ग से गुजरने वाले सभी जहाजों पर प्रतिबंध लग सकता है।

भारत व चीन की ऊर्जा आपूर्ति पर संभावित असर

भारत के लिए खाड़ी देशों से आयातित तेल व गैस का प्रतिशत लगभग 30 % से अधिक है, जबकि चीन ईरान का प्रमुख ऊर्जा आयातक है। दोनों देशों का अधिकांश तेल होर्मुज स्ट्रेट के संकरे जलमार्ग से गुजरता है। पहले, इज़राइल‑अमेरिका के हमले के बाद ईरान ने इस जलडमरूमध्य को ब्लॉक कर दिया था, जिससे भारत ने कूटनीतिक दबाव के बाद सीमित अनुमति प्राप्त की थी। अब अमेरिकी नाकेबंदी के बाद, भारतीय जहाजों को भी ईरानी टोल या शुल्क चुकाने के बिना पास नहीं किया जा सकेगा, जिससे सप्लाई चेन में व्यवधान की संभावना बढ़ गई है।

भारतीय टैंकरों की आवाजाही में नई चुनौती

अमेरिकी सेना ने कहा है कि ईरान के अलावा खाड़ी में अन्य देशों के बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही पर रोक नहीं होगी, लेकिन वास्तविकता इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान इस अवधि में कौन-से पोर्ट खोलता है। पिछले 40 दिनों में ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट पर कई बार ब्लॉकेड करके अपने नियंत्रण का प्रदर्शन किया है। यदि ईरान अमेरिकी नाकेबंदी का समर्थन करता है, तो खाड़ी से कोई भी जहाज, चाहे वह भारतीय हो या नहीं, निकलना कठिन हो जाएगा।

डोनाल्ड ट्रम्प का स्पष्ट बयान और ईरान की प्रतिक्रिया

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि वे उन सभी जहाजों को रोक देंगे जो ईरान को टोल देकर इस जलडमरूमध्य से गुजरते हैं। उनका यह कथन स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि टोल‑आधारित ट्रांसिट को भी बैन किया जाएगा। इस पर ईरान ने जवाब में कहा कि होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह उनका अधीन है और सभी गुजरने वाले जहाजों को रियाल में टोल‑टैक्स देना अनिवार्य होगा। ईरानी संसद के उपाध्यक्ष हाजी बाबाई ने रियाल में भुगतान को अनिवार्य करने की घोषणा की, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापारियों को नई वित्तीय बाधाएँ मिलेंगी।

भारत पर संभावित प्रभावों का सारांश

  • भारत खाड़ी से आयातित ऊर्जा का बड़ा हिस्सा प्राप्त करता है; नाकेबंदी से आयात में व्यवधान की आशंका।
  • पिछले अमेरिकी‑इज़राइली हमले के बाद भारतीय जहाजों को सीमित अनुमति मिली थी, लेकिन अब वही अनुमति हटने की संभावना।
  • ईरान, यदि अमेरिकी निर्देशों का पालन करता है, तो भारतीय टैंकरों को भी बंदरगाहों पर रुके रहने का आदेश दे सकता है।
  • टोल‑टैक्स के भुगतान के बिना भारतीय जहाजों को सुरक्षित रास्ता नहीं मिलेगा, जिससे अतिरिक्त लागत और देरी होगी।

नाकेबंदी के पीछे चीन के युआन को लक्ष्य बनाना

विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम का मूल उद्देश्य चीन के युआन का उपयोग करके किए जाने वाले तेल भुगतान को रोकना है। कई जहाज ईरान को पेमेंट करने के लिए युआन का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे पेट्रोडॉलर प्रणाली को विकल्प मिल रहा है। ट्रम्प प्रशासन इस दिशा में एक कड़ी नीति अपना रहा है, जिससे वह चीन और ईरान दोनों के खिलाफ आर्थिक दबाव बना सके। हालांकि, इराकी‑इरानी तेल निर्यात पर एक महीने की छूट की भी बात हुई, जिससे वैश्विक तेल प्रवाह को अस्थायी रूप से स्थिर रखने का मकसद भी स्पष्ट हुआ।

भविष्य में संभावित परिदृश्य

यदि नाकेबंदी लगातार बनी रहती है, तो भारत को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत खोजने या समुद्री रास्ते बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है। चीन भी अपने युआन‑आधारित तेल भुगतान मॉडल को पुनः विचार कर सकता है। इस बीच, अमेरिकी‑ईरानी तनाव बढ़ाने से क्षेत्रीय शिपिंग सुरक्षित नहीं रहेगी, और वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ने की संभावना है। भारतीय सरकार को जल्द से जल्द वैकल्पिक आपूर्ति चैनल और कूटनीतिक बातचीत को तेज करना होगा, ताकि ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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