संसद में गूंजा होर्मुज का मुद्दा
सिंगापुर ने ईरान को लेकर अपने इरादे साफ कर दिए हैं। देश के विदेश मंत्री विवियन बालाकृष्णन ने संसद को संबोधित करते हुए कहा कि ‘सिंगापुर होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित मार्ग के लिए बातचीत नहीं करेगा क्योंकि ऐसा करने से अंतरराष्ट्रीय कानून के बुनियादी सिद्धांत कमजोर होंगे।’ वह पिछले मंगलवार, 7 अप्रैल को संसद सदस्य फदली फौजी द्वारा पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रहे थे। बालाकृष्णन ने अपने बयान में बेहद कड़ा रुख अपनाया।
‘गुजरना अधिकार है, विशेषाधिकार नहीं’
विवियन बालाकृष्णन ने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों से गुजरना एक अधिकार है, कोई विशेषाधिकार नहीं। उन्होंने कहा, ‘वहां (होर्मुज) से गुजरने का एक अधिकार है। यह कोई विशेषाधिकार नहीं है जो सीमावर्ती देश द्वारा दिया जाए। यह कोई लाइसेंस नहीं है जिसके लिए मिन्नतें करनी पड़ें, और यह कोई शुल्क नहीं है जिसका भुगतान करना पड़े।’
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि होर्मुज स्ट्रेट, मलक्का और सिंगापुर जलडमरूमध्य की तरह ही अंतर्राष्ट्रीय नौवहन के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक जलमार्ग है। यह अधिकार ‘समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय’ (UNCLOS) में दर्ज है, जिस पर सिंगापुर ने भी हस्ताक्षर किए हैं।
UNCLOS पर सिंगापुर का कड़ा रुख
विदेश मंत्री बालाकृष्णन ने यह भी स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत उन देशों पर भी लागू होता है जिन्होंने UNCLOS की पुष्टि नहीं की है। उन्होंने कहा कि यह उनके लिए “जेल से बाहर निकलने का मुफ्त कार्ड” नहीं है। उन्होंने अपने कानूनी और सख्त रवैये का कारण बताते हुए कहा, ‘आप सोच रहे होंगे कि मैं इतनी कानूनी और सख्त परिभाषा क्यों अपना रहा हूं और ऐसा इसलिए नहीं है कि मुझे कानून से कोई खास लगाव है, बल्कि इसलिए है कि मलक्का जलडमरूमध्य और सिंगापुर जलडमरूमध्य असल में एक और महत्वपूर्ण ‘चोक पॉइंट’ हैं।’
क्यों होर्मुज से भी ज्यादा अहम है सिंगापुर स्ट्रेट?
ईरान जिस होर्मुज स्ट्रेट को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है, उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण मलक्का और सिंगापुर स्ट्रेट हैं, जहां से जहाज बिना किसी शुल्क के गुजरते हैं। दोनों के बीच के अंतर को इन बिंदुओं से समझा जा सकता है:
- व्यापारिक गलियारा: सिंगापुर स्ट्रेट दुनिया का सबसे व्यस्त व्यापारिक गलियारा है। यह दुनिया के कुल समुद्री व्यापार का लगभग 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा संभालता है, जबकि होर्मुज मुख्य तौर पर तेल और गैस के कारोबार के लिए इस्तेमाल होता है।
- बंदरगाह की व्यस्तता: सिंगापुर पोर्ट दुनिया का दूसरा सबसे व्यस्त कंटेनर पोर्ट है। 2025 में यहां रिकॉर्ड 44.66 मिलियन कंटेनर्स का आवागमन हुआ था।
- तेल का प्रवाह: तेल कारोबार में भी सिंगापुर स्ट्रेट आगे है। यहां से प्रतिदिन लगभग 23.2 मिलियन बैरल तेल गुजरता है, जबकि होर्मुज स्ट्रेट से शांति काल में हर दिन करीब 20.9 मिलियन बैरल तेल का प्रवाह होता है।
- एशियाई देशों की निर्भरता: यह चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े देशों की 80% से ज्यादा तेल की जरूरतों को पूरा करता है। अगर सिंगापुर इसे बंद कर दे तो इन देशों में हाहाकार मच जाएगा।
- चौड़ाई का अंतर: होर्मुज स्ट्रेट लगभग 32-33 किलोमीटर चौड़ा है, लेकिन सिंगापुर स्ट्रेट सिर्फ 3.7 किलोमीटर चौड़ा है, जिसे ब्लॉक करना कहीं ज्यादा आसान है।
‘यह सिद्धांत की बात है’: सिंगापुर ने खींची लक्ष्मण रेखा
सिंगापुर ने साफ कहा है कि होर्मुज पर ईरान से बात न करना एक सिद्धांत का मामला है। बालाकृष्णन ने बताया कि उन्होंने ईरान के विदेश मंत्री से बात की है, लेकिन होर्मुज स्ट्रेट को लेकर कोई चर्चा नहीं की। उन्होंने कहा, ‘होर्मुज एक साफ लक्ष्मण रेखा है। ये सिद्धांत की बात है और इसका मतलब ये नहीं है कि हम किसी का पक्ष ले रहे हैं। मैं जहाजों के सुरक्षित गुजरने को लेकर ईरान से कोई बात नहीं कर सकता। ना ही मैं जहाजों के गुजरने को लेकर टोल देने पर कोई बात कर सकता हूं, क्योंकि अगर मैं ऐसा करता हूं तो परोक्ष रूप से कानूनी सिद्धांत को मैं कमजोर करूंगा।’
ईरान के लिए भी लाइफलाइन है सिंगापुर स्ट्रेट
दिलचस्प बात यह है कि ईरान खुद सिंगापुर स्ट्रेट पर बहुत अधिक निर्भर है। ईरान अपने कुल तेल निर्यात का लगभग 90 फीसदी हिस्सा चीन को बेचता है, जो सिंगापुर स्ट्रेट से ही गुजरता है। 2024 में, ईरान ने चीन को हर दिन लगभग 1.21 मिलियन बैरल तेल भेजा, जो इसी रास्ते से होकर गया। इसके अलावा, ईरान अमेरिका को चकमा देकर मलेशिया जैसे देशों को भी तेल बेचता है, और यह व्यापार भी सिंगापुर स्ट्रेट से ही होता है। ऐसे में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरानी बंदरगाहों की घेराबंदी की घोषणा से सिंगापुर स्ट्रेट की ओर जाने वाले ईरानी जहाजों के लिए खतरा बढ़ गया है।
कौन हैं भारतवंशी विदेश मंत्री विवियन बालाकृष्णन?
सिंगापुर के विदेश मंत्री डॉ. विवियन बालाकृष्णन की जड़ें भारत से जुड़ी हैं। उनके पिता, जीडी बालाकृष्णन, एक तमिल-भारतीय थे, जो भारत के तमिलनाडु राज्य से ताल्लुक रखते थे। उनकी मां चीनी मूल की हैं, जिस वजह से उन्हें कई बार ‘चिनडियन’ भी कहा जाता है। वह सिंगापुर की एक प्रमुख भारतीय-सिंगापुरी हस्ती हैं और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने देश का मजबूती से प्रतिनिधित्व करते हैं।
