ईरान के हमले का डर: तुर्की UAE के निवेशकों को लुभाने में जुटा, दुबई छोड़ इस्तांबुल आने का दिया न्योता

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच तुर्की एक नई आर्थिक रणनीति पर काम कर रहा है। ईरान के मिसाइल हमलों का डर दिखाकर तुर्की, दुबई में स्थित वैश्विक निवेशकों और कंपनियों को संयुक्त अरब अमीरात (UAE) छोड़कर इस्तांबुल आने का न्योता दे रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की सरकार दुबई को एक असुरक्षित वित्तीय केंद्र के रूप में पेश करके निवेशकों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए टैक्स छूट जैसे बड़े प्रस्ताव दे रही है।

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ईरान का डर दिखाकर निवेशकों को लुभाने की कोशिश

मिडिल ईस्ट आई की एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है कि तुर्की की सरकार संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में स्थित निवेशकों और कंपनियों को तुर्की की तरफ आकर्षित करने के लिए सक्रिय रूप से तरीके तलाश रही है। ईरान ने हाल के दिनों में मध्य पूर्व के कई देशों पर मिसाइल हमले किए हैं, जिनमें दुबई पर दागी गई बैलिस्टिक मिसाइलें भी शामिल हैं। तुर्की इसी स्थिति का फायदा उठाने की फिराक में है और दुबई को एक असुरक्षित शहर के तौर पर पेश कर रहा है।

रिपोर्ट में तुर्की के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि अंकारा अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को इस्तांबुल में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करने की योजना बना रहा है। इसके तहत बहुराष्ट्रीय कंपनियों को टैक्स में विशेष छूट और अन्य प्रकार की सहायता देने का वादा किया जा रहा है। यह सहायता और छूट ठीक वैसी ही होगी जैसी ‘इस्तांबुल फाइनेंशियल सेंटर’ (IFC) में पहले से दी जा रही है। अधिकारी ने कहा, ‘इस बात की प्रबल संभावना है कि ईरान, UAE के वित्तीय केंद्रों जैसे अबू धाबी और दुबई में मौजूद अंतरराष्ट्रीय कंपनियों को निशाना बना सकता है। इस खतरे को देखते हुए कुछ कंपनियां अपना ठिकाना बदलकर तुर्की में स्थानांतरित हो सकती हैं।’

इस्तांबुल में क्या हैं निवेशकों के लिए बड़े प्रस्ताव?

दुबई वर्तमान में कई अंतरराष्ट्रीय बैंकों, वित्तीय सेवा कंपनियों, टेक स्टार्टअप्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस फर्मों, डेटा सेंटरों और विनिर्माण कंपनियों का एक प्रमुख केंद्र है। तुर्की इसी निवेशक वर्ग को इस्तांबुल की ओर खींचना चाहता है। इस्तांबुल का वित्तीय जिला, IFC, पहले से ही कई तरह की आकर्षक टैक्स छूट प्रदान करता है। यहां, वित्तीय सेवाओं के निर्यात से होने वाली आय को कॉर्पोरेट इनकम टैक्स से पूरी तरह छूट दी गई है। साथ ही, इससे जुड़े लेन-देन पर लगने वाले अन्य शुल्कों को भी माफ कर दिया गया है।

इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय अनुभव वाले कर्मचारियों के लिए पेरोल टैक्स में भी भारी छूट का प्रावधान है। उनके विदेश में काम करने के वर्षों के आधार पर, उनकी मासिक सैलरी का 60% या 80% हिस्सा आयकर से मुक्त होता है। ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार, तुर्की की सरकार इन टैक्स छूटों का दायरा और भी बढ़ाने की तैयारी कर रही है, खासकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए। एक नए प्रस्ताव के तहत, कंपनियों को विदेश से मंगाई गई वस्तुओं को तुर्की लाए बिना ही उनकी बिक्री या मध्यस्थता से होने वाली कमाई का 50 प्रतिशत हिस्सा टैक्स में से घटाने की अनुमति दी जा सकती है।

वैश्विक मंच पर राष्ट्रपति एर्दोगन की सक्रियता

रिपोर्टों से यह संकेत मिल रहे हैं कि विदेशी कंपनियों की तुर्की में रुचि बढ़ रही है। इसी महीने की शुरुआत में, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोगन ने इस्तांबुल में विश्व आर्थिक मंच (WEF) द्वारा आयोजित एक विशेष बैठक में 40 वैश्विक कंपनियों के सीईओ की मेजबानी की। इस बैठक में शामिल कंपनियों की कुल संपत्ति खरबों डॉलर थी। यह बैठक इसलिए भी महत्वपूर्ण थी क्योंकि राष्ट्रपति एर्दोगन ने 2009 के बाद से WEF के वार्षिक दावोस शिखर सम्मेलन में भाग नहीं लिया था। इसका कारण गाजा में फिलिस्तीनियों की मौत को लेकर तत्कालीन इजरायली राष्ट्रपति शिमोन पेरेस के साथ उनका सार्वजनिक विवाद था।

निवेशकों के सामने तुर्की में बड़ी चुनौतियां

हालांकि, मिडिल ईस्ट आई द्वारा किए गए साक्षात्कारों से पता चलता है कि तुर्की को UAE-स्थित निवेशकों और व्यवसायों को आकर्षित करने में कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। विश्लेषकों और निवेशकों ने नाम न बताने की शर्त पर खुलकर अपनी चिंताएं जाहिर कीं। सबसे बड़ी समस्याओं में से एक तुर्की की अनियंत्रित महंगाई है, जिसके इस साल 25 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। इसके अलावा, देश का बढ़ता व्यापार घाटा भी निवेशकों के लिए एक चिंता का विषय है।

निवेशक कुछ अन्य सरकारी नीतियों को लेकर भी आशंकित हैं। इसमें सरकार द्वारा फिनटेक फर्मों और विदेशी निवेश वाली कंपनियों को जब्त करने की प्रवृत्ति शामिल है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण ‘पपारा’ (Papara) नामक कंपनी है, जो एक अरब डॉलर से अधिक मूल्य का स्टार्टअप था और देश का पहला फिनटेक यूनिकॉर्न बना था। एर्दोगन सरकार ने इस कंपनी को जब्त कर लिया था, जिससे निवेशकों का भरोसा हिला हुआ है।

कानूनी व्यवस्था और अदालतों पर भरोसे का संकट

तुर्की में कानून के शासन को लेकर निवेशकों में भारी चिंता है। एक अंतरराष्ट्रीय बैंकर ने ‘मिडिल ईस्ट आई’ को स्पष्ट रूप से बताया, “तुर्की की अदालतों पर किसी को भरोसा नहीं है।” उनका कहना है कि तुर्की सरकार किसी न किसी कानून का सहारा लेकर कंपनियों को परेशान करती है और अदालतों में उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद बहुत कम होती है।

इसके विपरीत, दुबई इंटरनेशनल फाइनेंशियल सेंटर (DIFC) अपने स्वयं के नागरिक और वाणिज्यिक कानूनों के तहत काम करता है, जो UAE की सामान्य कानूनी प्रणाली से पूरी तरह अलग है। DIFC का कानूनी ढांचा इंग्लिश कॉमन लॉ पर आधारित है और इसमें एक स्वतंत्र न्यायपालिका है, जिसे ‘DIFC कोर्ट्स’ के नाम से जाना जाता है। यह पारदर्शी और विश्वसनीय कानूनी प्रणाली निवेशकों को सुरक्षा का एहसास कराती है, जो तुर्की में फिलहाल नदारद है।

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