शांति वार्ता के विफल होने पर ईरान की प्रतिक्रिया
ईरानी संसद के स्पीकर बाघर गालिबफ ने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर की गई अपनी पोस्ट्स में इस वार्ता के असफल होने पर निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि बातचीत शुरू होने से पहले उन्होंने अच्छी नीयत और इच्छाशक्ति की बात पर जोर दिया था। लेकिन पिछले दो युद्धों के अनुभवों को देखते हुए, उन्हें अमेरिका पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं था। गालिबफ ने लिखा कि ईरान के प्रतिनिधिमंडल के साथियों ने भविष्योन्मुखी पहल करने की कोशिश की, लेकिन अमेरिकी पक्ष आखिरकार इस बातचीत में ईरान का भरोसा जीतने में नाकाम रहा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका ने ईरान के तर्कों और सिद्धांतों को समझ लिया है, और अब यह अमेरिका पर निर्भर करता है कि वह ईरान का भरोसा जीत पाता है या नहीं।
ईरानी स्पीकर का आभार और कूटनीति पर जोर
ईरानी संसद के स्पीकर बाघर गालिबफ ने इस शांति वार्ता को संभव बनाने में मदद करने के लिए पाकिस्तान के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने पाकिस्तान को एक मित्रवत और भाईचारा निभाने वाला देश बताते हुए वहां की जनता का अभिवादन किया। गालिबफ ने कहा कि ईरान हर माध्यम को सैन्य संघर्ष के साथ-साथ ईरानी राष्ट्र के अधिकारों की रक्षा के लिए ‘अधिकार-आधारित कूटनीति’ का एक और तरीका मानता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि ईरान अपनी राष्ट्रीय रक्षा की उपलब्धियों को मजबूत करने के प्रयासों में कभी भी विराम नहीं देगा।
ईरानी लोगों और प्रतिनिधिमंडल की प्रशंसा
बाघर गालिबफ ने ईरान की 9 करोड़ जनता को एक “शरीर” के रूप में संबोधित किया। उन्होंने उन सभी वीर ईरानी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया जिन्होंने सर्वोच्च नेता की सलाह का पालन करते हुए सड़कों पर उतरकर अपने बच्चों (देश के जवानों) का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि देशवासियों के आशीर्वाद से ही वे इस राह पर आगे बढ़ रहे हैं। गालिबफ ने 21 घंटे की गहन वार्ताओं में उनके साथ रहे सहयोगियों की भी प्रशंसा की और उन्हें शक्ति प्रदान करने के लिए अल्लाह से प्रार्थना की। उन्होंने ‘हमारा प्यारा ईरान अमर रहे और सदा बना रहे!’ कहकर अपनी बात समाप्त की।
ईरान-अमेरिका के बीच पहली उच्च-स्तरीय राजनीतिक संपर्क
पाकिस्तान में हुई यह बैठक अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के बीच यह पहला उच्च-स्तरीय राजनीतिक संपर्क था। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेजी वेंस विशेष रूप से ईरान के उच्च-स्तरीय अधिकारियों से मिलने के लिए पाकिस्तान पहुंचे थे। तेहरान की ओर से इस बैठक का नेतृत्व स्वयं ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघर गालिबफ कर रहे थे।
ऐतिहासिक संदर्भ: ओबामा-रूहानी बातचीत
दोनों शीर्ष अधिकारियों के बीच इस सीधे संपर्क की तुलना 27 सितंबर 2013 को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी के बीच हुई टेलीफोन बातचीत से की जा सकती है। यह बातचीत तब हुई थी जब रूहानी न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाग लेने गए थे। 1979 में दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध टूटने के बाद यह पहला अवसर था जब दोनों देशों के राष्ट्रपतियों के बीच सीधे तौर पर बात हुई थी। उस 15 मिनट की फोन कॉल ने दो साल तक चली उन वार्ताओं की नींव रखी, जिसके परिणामस्वरूप 2015 में ऐतिहासिक JCPOA (संयुक्त व्यापक कार्य योजना) समझौता हुआ था।
JCPOA समझौते का टूटना और बिगड़ते संबंध
हालांकि, यह शांति और कूटनीति का दौर ज्यादा लंबा नहीं चला। 2018 में, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने कार्यकाल के दौरान अमेरिका को एकतरफा तरीके से JCPOA समझौते से बाहर कर लिया। इस कदम ने दोनों देशों के बीच संबंधों को फिर से गंभीर रूप से खराब कर दिया। इसके बाद से ही अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और अविश्वास का माहौल बना हुआ है, जो हाल ही में पाकिस्तान में हुई इस शांति वार्ता की विफलता से एक बार फिर स्पष्ट हो गया है।
ईरानी संसद के स्पीकर का विस्तृत बयान
ईरानी संसद के स्पीकर बाघर ग़ालिबफ़ ने एक्स पर दिए अपने विस्तृत बयान में कहा, ‘हम हर माध्यम को सैन्य संघर्ष के साथ-साथ ईरानी राष्ट्र के अधिकारों की रक्षा हेतु ‘अधिकार-आधारित कूटनीति’ का एक और तरीका मानते हैं। और ईरान की राष्ट्रीय रक्षा के उन चालीस दिनों की उपलब्धियों को मजबूत करने के हमारे प्रयासों में हम एक पल के लिए भी विराम नहीं देंगे।’ उन्होंने पाकिस्तान के प्रयासों के लिए आभार व्यक्त करते हुए कहा, ‘मैं हमारे मित्रवत और भाईचारे वाले देश पाकिस्तान के उन प्रयासों के लिए भी आभारी हूं जिन्होंने इन वार्ताओं की प्रक्रिया को सुगम बनाने में मदद की और मैं पाकिस्तान की जनता को अपना सादर अभिवादन भेजता हूं।’
ईरानी प्रतिनिधिमंडल की कूटनीतिक पहल
उन्होंने आगे लिखा, ‘ईरानी प्रतिनिधिमंडल में मेरे साथियों मिनाब168 ने आगे की सोच वाली पहल की लेकिन दूसरी तरफ वाला आखिरकार इस बातचीत के दौर में [ईरानी डेलीगेशन] का भरोसा जीतने में नाकाम रहा।’ ग़ालिबफ़ ने यह भी जोड़ा, ‘अमेरिका ने हमारे तर्क और सिद्धांतों को समझ लिया है और अब उसके लिए यह तय करने का समय आ गया है कि क्या वह हमारा भरोसा जीत सकता है या नहीं?’
पाकिस्तान में शीहबाज शरीफ और गालिबफ की मुलाकात
इस शांति वार्ता के दौरान की एक अहम तस्वीर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और ईरानी संसद के स्पीकर बाघर ग़ालिबफ़ की मुलाकात की भी सामने आई। दोनों नेताओं ने हाथ मिलाकर इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक बैठक के समापन पर अपने विचार साझा किए। यह मुलाकात इस बात का प्रतीक थी कि कैसे क्षेत्रीय देश शांति और कूटनीति के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय तनाव को कम करने का प्रयास करते हैं, भले ही वे स्वयं सीधी बातचीत में असफल रहे हों।
वार्ता के विफल होने के निहितार्थ
इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता का विफल होना क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई निहितार्थ रखता है। यह दर्शाता है कि दोनों देशों के बीच विश्वास की खाई अभी भी बहुत गहरी है और 1979 की क्रांति के बाद से चले आ रहे मतभेद इतने आसानी से दूर होने वाले नहीं हैं। JCPOA समझौते के टूटने के बाद से तनाव में लगातार वृद्धि हुई है, और इस तरह की सीधी बातचीत की विफलता से यह संकेत मिलता है कि भविष्य में तनाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है।
भविष्य की राह: अविश्वास और कूटनीतिक प्रयास
अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास की जड़ें इतनी गहरी हैं कि किसी एक वार्ता से इन मुद्दों का समाधान संभव नहीं है। बाघर गालिबफ के बयान ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक अमेरिका ईरान का भरोसा नहीं जीत लेता, तब तक कूटनीति का रास्ता कठिन बना रहेगा। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भविष्य में दोनों देश इस दिशा में क्या कदम उठाते हैं और क्या वे पिछली विफलताओं से सीख लेकर आगे बढ़ पाते हैं या फिर तनाव का यह दौर जारी रहता है।
