ईरान ने अमेरिकी तीन शर्तें अस्वीकार की, इस्लामाबाद वार्ता में टूट गया समझौता, जेडी वेंस ने बताया

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि इस्लामाबाद में हुए 15‑घंटे की वार्ता के बावजूद ईरान ने अमेरिका की तीन प्रमुख शर्तें नहीं मानीं, जिससे दोनों देशों के बीच समझौता पूरी तरह से टूट गया। वेंस ने बताया कि अब अमेरिका और ईरान की बातचीत फिर से शुरू नहीं होगी।

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इस्लामाबाद में वार्ता का संक्षिप्त विवरण

अमेरिका और ईरान की टीमें इस साल की शुरुआत में इस्लामाबाद में एकत्र हुईं, जहाँ दोनों पक्षों ने 15 घंटे से अधिक की मैराथन मीटिंग की। यह बैठक युद्धविराम के बाद हुई थी, जिसका उद्देश्य दो देशों के बीच पारस्परिक संदेह को कम करना और संभावित समझौते की रूपरेखा तैयार करना था। हालांकि, बैठक के अंतिम चरण में दोनों पक्षों के बीच प्रतिपादन में अंतर स्पष्ट हो गया, जिससे कोई अंतिम समझौता नहीं बन सका। जेडी वेंस ने बताया कि ईरान ने अमेरिकी रेड लाइन्स को “साफ़” कर दिया, लेकिन उनकी शर्तों को स्वीकार नहीं किया।

अमेरिका की तीन शर्तें जिनपर ईरान ने इनकार किया

  • ईरान का यूरेनियम संवर्धन और उसके परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से रोकना।
  • होर्मुज जलडमरूमध्य में 28 फरवरी के पहले की तरह जहाज़ों की स्वतंत्र शिपिंग की अनुमति देना।
  • लेबनान में हिज़्बुल्ला के खिलाफ इज़राइल के सैन्य अभियान पर ईरान का समर्थन न करना।

इन शर्तों को पूरा करने के लिए ईरान को कई प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता, जिससे वह अपनी क्षेत्रीय रणनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में देखता। इस कारण अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल ने उन शर्तों पर ज़ोर दिया, जबकि ईरान ने उन्हें अस्वीकार कर दिया।

ईरान की दोहरी मांगें और अमेरिकी टीम की प्रतिक्रिया

तस्नीम न्यूज एजेंसी के अनुसार, वार्ता के दौरान ईरान और अमेरिकी प्रतिनिधिमंडलों ने आमने‑सामने बातचीत के बाद टेक्स्ट‑आधारित चरण में पहुँच कर एक साझा ढाँचा तैयार करने की कोशिश की। परन्तु अमेरिकी टीम ने “बार‑बार की अत्यधिक मांगों” के कारण प्रक्रिया में बाधा डाली। अमेरिकी पक्ष का कहना था कि उन्होंने ईरान को स्पष्ट रूप से अपनी “रेड लाइन्स” समझा दी हैं, जबकि ईरानी पक्ष ने इन शर्तों को अत्यधिक कठोर बताया।

जेडी वेंस ने दीं प्रमुख टिप्पणियाँ

जब से पूछे जाने पर जेडी वेंस ने यह स्पष्ट किया कि ईरान ने किन शर्तों को अस्वीकार किया, पर उन्होंने विस्तृत जानकारी नहीं दी। उन्होंने कहा, “हमें पक्की जुबान चाहिए कि वे परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं करेंगे।” इस बयान से पता चलता है कि अमेरिकी सरकार को ईरान से परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने की गारंटी चाहिए, साथ ही वह किसी भी संभावित ‘साधन’ को रोकना चाहता है जिससे तेज़ी से ह्थियार बन सके। वेंस ने आगे बताया, “ईरान को हमारी गारंटी चाहिए कि वे परमाणु हथियार बनाने की कोई कोशिश नहीं करेंगे।” यह अमेरिका की प्राथमिकता है, और यही लक्ष्य वार्ता के दौरान प्रमुख रूप से रखा गया था।

वार्ता के टूटने का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव

इस वार्ता के विफल होने से मध्य पूर्व में तनाव की स्थिति फिर से बढ़ सकती है। ईरान की शर्तों को न मानने का निर्णय कई साझेदार देशों, विशेषकर यूरोपीय संघ और चीन को भी नज़र में आ गया है, जो दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाये रखने की कोशिश कर रहे थे। अमेरिकी उपराष्ट्रपति ने बताया कि अब “हम वापस जा रहे हैं” और वार्ता फिर से शुरू नहीं होगी, जिससे दोनों देशों के बीच मौजूदा संकुचन के ऊपर नई लकीरें बन सकती हैं।

आगे क्या हो सकता है?

जेडी वेंस के बयान के बाद, अमेरिकी विदेश विभाग ने संकेत दिया है कि वह अपने मौजूदा प्रतिबंधों को मजबूत करेगा और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ाएगा। वहीं ईरान की सरकारी एजेंसियों ने कहा है कि वे अमेरिकी “अत्यधिक” मांगों के सामने नहीं झुकेंगे और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा जारी रखेंगे। इस टकराव के परिणामस्वरूप, भविष्य में दोनों देशों के बीच नई कूटनीतिक पहलों के बजाय आर्थिक और सैन्य दबाव बढ़ने की संभावनाएँ अधिक प्रतीत होती हैं।

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