होर्मुज नाकाबंदी: अमेरिका ने F-35B, 15 युद्धपोत और 5000 मरीन कमांडो तैनात कर की घेराबंदी, माइंसस्वीपर सक्रिय

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश के बाद अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट को रणनीतिक रूप से अवरुद्ध करने के लिए एक विशाल सैन्य घेराबंदी शुरू कर दी है। इस अभियान के तहत विध्वंसक जहाजों, सोनार तकनीक से लैस पोतों और हजारों की संख्या में मरीन सैनिकों को तैनात किया गया है। एफ-35बी लड़ाकू विमान, एमवी-22 ऑस्प्रे तथा 15 युद्धपोत भी होर्मुज की नाकाबंदी में शामिल हैं, जिसका उद्देश्य धीरे-धीरे जलडमरूमध्य पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना है। ईरान ने बिना टोल शुल्क के इसे खोलने से इनकार कर दिया है, जिससे क्षेत्र में एक नाजुक युद्धविराम के टूटने का खतरा बढ़ गया है।

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होर्मुज स्ट्रेट का रणनीतिक महत्व और अमेरिकी कार्रवाई

होर्मुज स्ट्रेट, जिसे फारस की खाड़ी का प्रवेश द्वार कहा जाता है, वैश्विक तेल व्यापार के लिए एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। दुनिया के तेल का लगभग 20% इसी जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है, जिससे इसकी रणनीतिक अहमियत और भी बढ़ जाती है। अमेरिका की यह सैन्य कार्रवाई ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी साबित हो सकती है, क्योंकि यह उसके तेल और गैस की आपूर्ति को पूरी तरह से ठप कर सकती है, जिससे उसकी पहले से ही युद्धग्रस्त अर्थव्यवस्था पंगु हो जाएगी। अमेरिकी सेना का मुख्य उद्देश्य इस महत्वपूर्ण जलमार्ग पर अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना है, ताकि ईरान पर अधिकतम दबाव डाला जा सके।

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दिए गए सीधे आदेश के बाद अमेरिकी सेना ने होर्मुज स्ट्रेट में प्रवेश करने या बाहर निकलने वाले सभी जहाजों को रोकने की तैयारी की है। इस व्यापक घेराबंदी में केवल युद्धपोत ही शामिल नहीं हैं, बल्कि विशेष प्रकार के विमान और हजारों मरीन कमांडो भी तैनात किए गए हैं। यह स्थिति इस क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनाव को एक नए चरम पर पहुंचा रही है, जहां एक छोटी सी चिंगारी भी बड़े पैमाने पर संघर्ष का कारण बन सकती है।

अमेरिकी सैन्य शक्ति की व्यापक तैनाती

अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के पूर्व कमांडर मरीन जनरल फ्रैंक मैकेंज़ी ने ‘द सन’ की एक रिपोर्ट में बताया है कि “हम जलडमरूमध्य क्षेत्र पर नियंत्रण करने और आवश्यकता पड़ने पर अंतर्देशीय क्षेत्रों में भी कार्रवाई करने की योजनाओं पर वर्षों से काम कर रहे हैं।” यह बयान अमेरिका की दीर्घकालिक रणनीति को उजागर करता है, जिसमें होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण स्थापित करना एक केंद्रीय बिंदु रहा है। वर्तमान तैनाती इसी योजना का परिणाम है, जिसमें कई उन्नत सैन्य परिसंपत्तियां शामिल हैं।

होर्मुज को अवरुद्ध करने के लिए अमेरिकी सेना ने एम्फीबियस असॉल्ट शिप USS Tripoli को तैनात किया है, जो लगभग 2700 मरीन सैनिकों को लेकर पहुंचा था। यह युद्धपोत F-35B लाइटनिंग II स्टेल्थ फाइटर जेट और MV-22 ऑस्प्रे जैसे अत्याधुनिक विमानों से लैस है। यह तैनाती अरब सागर में स्थित ईरानी तटीय इलाकों को निशाना बनाने के लिए अमेरिका की एक बड़ी सैन्य मुहिम का हिस्सा है। USS Tripoli, जिसे बिना किसी पारंपरिक वेल डेक के डिजाइन किया गया है, इसमें अधिक F-35B विमान, MV-22 ऑस्प्रे, हेलीकॉप्टर और उनके रखरखाव के लिए अतिरिक्त जगह मिल पाती है। CENTCOM ने यह भी बताया है कि यह जहाज अपने चरम संचालन के दौरान 20 से अधिक F-35B विमानों को सहायता देने की क्षमता रखता है, जो इसकी मारक क्षमता को दर्शाता है।

माइनस्वीपर जहाजों की महत्वपूर्ण भूमिका और तकनीकी क्षमताएं

इस सैन्य अभियान का एक महत्वपूर्ण पहलू विशेष सेंसरों से लैस तीन हल्के हथियारों से लैस माइनस्वीपर जहाजों की तैनाती है। ये जहाज होर्मुज स्ट्रेट में ईरान द्वारा बिछाए गए माइंस को खोजने का काम कर रहे हैं। कम से कम दो विध्वंसक जहाजों से घिरे ये माइनस्वीपर जहाज विशेष रूप से माइंस का पता लगाने के लिए ही बनाए गए हैं। यदि ये जहाज ईरानी माइंस का सफलतापूर्वक पता लगा लेते हैं, तो यह रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) के लिए एक बड़ा झटका होगा, क्योंकि माइंस ईरान की रक्षा रणनीति का एक अहम हिस्सा रही हैं।

इसके अतिरिक्त, समुद्री खाड़ी के उथले पानी में तट के करीब संचालन के लिए डिजाइन किए गए छोटे एल्यूमीनियम फ्रिगेट, जिन्हें लिटोरल कॉम्बैट शिप (LCS) के नाम से जाना जाता है, वे बारूदी सुरंगों का पता लगाने के लिए अत्यधिक संवेदनशील AQS-20 सोनार से लैस हैं। 38 फीट लंबे पानी के भीतर के ड्रोन और लिटोरल शिप यूएसएस कैनबरा, यूएसएस सांता बारबरा और यूएसएस तुलसा से उड़ान भरने वाले एमएच-60 सीहॉक हेलीकॉप्टर मुख्य जहाजों से मीलों दूर पानी में गहन खोजबीन कर रहे हैं। इन उन्नत तकनीकों का उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है कि होर्मुज स्ट्रेट को ईरानी माइंस से पूरी तरह सुरक्षित किया जा सके, जिससे अमेरिकी नौसेना के बड़े युद्धपोतों के लिए फारस की खाड़ी में आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो सके।

ईरान की धमकियां और रिवोल्यूशनरी गार्ड की क्षमताएं

यह सैन्य घेराबंदी ऐसे समय में हो रही है जब ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने संकरे 20 मील चौड़े जलडमरूमध्य में प्रवेश करने वाले अमेरिकी जहाजों के खिलाफ भयावह धमकियां जारी की हैं। IRGC ने ओमान सागर में मौजूद सभी जहाजों को चेतावनी दी है कि वे “दस मील से अधिक करीब न आएं अन्यथा हम गोलीबारी करेंगे।” यह चेतावनी सीधे तौर पर अमेरिकी कार्रवाई का जवाब है और क्षेत्र में तनाव की उच्च स्थिति को दर्शाती है।

अमेरिका ने दावा किया है कि पिछले महीने हुए लगातार हवाई हमलों में ईरान की अधिकांश नौसेना नष्ट हो चुकी है, जिनमें उसके सभी फ्रिगेट, ड्रोन वाहक और पनडुब्बियां डूब गई हैं। हालांकि, रिवोल्यूशनरी गार्ड के पास अभी भी सैकड़ों तेज गति से हमला करने वाली ‘तारेघ स्पीडबोट’ हैं, जिन पर कम दूरी की मिसाइलें और कच्चे रॉकेट से चलने वाले ग्रेनेड लगे हुए हैं। ये स्पीडबोट छोटे पैमाने के, तीव्र हमलों के लिए बेहद प्रभावी मानी जाती हैं और अमेरिकी नौसेना के लिए एक चुनौती पेश कर सकती हैं, खासकर सीमित जलडमरूमध्य क्षेत्र में।

5000 अमेरिकी मरीन कमांडो की तैनाती

यूएसएस त्रिपोली और यूएसएस बॉक्सर युद्धपोत पर अमेरिका के करीब 4700 से 5000 मरीन कमांडो इस क्षेत्र में मौजूद हैं। ये कमांडो रात में एम्फीबियस अटैक जहाजों से हेलीकॉप्टरों के जरिए उतरकर द्वीपों और तटीय मिसाइल ठिकानों को खाली करवा सकते हैं। बारूदी सुरंगों को हटाने से अमेरिका के बड़े जंगी जहाजों को भी फारस की खाड़ी में आगे बढ़ने का मौका मिल जाता है ताकि वे ईरान के बंदरगाहों की घेराबंदी कर सकें, उन्हें घेर सकें और शायद खर्ग द्वीप पर मौजूद अहम तेल टर्मिनल पर कब्जा कर सकें। ट्रंप की नजरें पूरी तरह से खर्ग द्वीप पर टिकी हुई हैं, जहां से ईरान के 95 फीसदी तेल की शिपिंग होती है। इस द्वीप पर कब्जा करना ईरान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह से ठप करने की दिशा में एक निर्णायक कदम होगा।

युद्धविराम की नाजुक स्थिति और भविष्य के निहितार्थ

होर्मुज स्ट्रेट की यह नाकाबंदी एक अत्यंत नाजुक युद्धविराम की स्थिति में हो रही है। यदि ईरान अमेरिकी युद्धपोतों पर फायरिंग शुरू करता है, तो यह युद्धविराम तुरंत टूट जाएगा और एक पूर्ण युद्ध शुरू हो सकता है। कुछ विश्लेषकों का मानना ​​है कि अमेरिका शायद ऐसा ही चाह रहा होगा, ताकि ईरान पर अधिकतम सैन्य और आर्थिक दबाव बनाया जा सके। यह स्थिति वैश्विक ऊर्जा बाजारों को अस्थिर कर सकती है और पूरे पश्चिम एशिया क्षेत्र में व्यापक संघर्ष का कारण बन सकती है। आने वाले दिन इस बात का निर्धारण करेंगे कि क्या यह घेराबंदी सफल होती है और क्या क्षेत्र में शांति बनी रहती है, या फिर यह एक बड़े संघर्ष की शुरुआत है।

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