होर्मुज स्ट्रेट से अमेरिकी जहाजों के गुजरने का दावा; ट्रंप बोले – हम समुद्री मार्ग खोल रहे, ईरान ने दी चेतावनी

इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम समझौते पर बातचीत जारी रहने के बावजूद, शनिवार को अमेरिकी नौसेना के जहाजों ने कथित तौर पर होर्मुज स्ट्रेट को पार किया। इस घटनाक्रम ने क्षेत्रीय तनाव को बढ़ा दिया, खासकर जब ईरान ने दावा किया कि उसने अमेरिकी जहाजों को चेतावनी देकर वापस मोड़ दिया था। वहीं, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समुद्री मार्ग को दुनिया के लिए 'खोलने' का दावा किया है, जिससे स्थिति और जटिल हो गई है।

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होर्मुज स्ट्रेट: रणनीतिक महत्व और हालिया घटनाक्रम

होर्मुज स्ट्रेट, जिसे अक्सर दुनिया की तेल धमनी कहा जाता है, वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण जलमार्ग है। यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है, जिससे दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का लगभग एक-तिहाई हिस्सा इसी मार्ग से होकर गुजरता है। इस महत्वपूर्ण मार्ग पर ईरान का नियंत्रण है और वह चुनिंदा जहाजों को ही इससे गुजरने की अनुमति देता है, विशेषकर अमेरिका और इजरायल से संबंधित जहाजों के लिए ‘नो एंट्री’ लागू है। ऐसे में, अमेरिकी नौसेना के जहाजों द्वारा शनिवार को इस जलडमरूमध्य को पार करने का दावा एक बड़ा घटनाक्रम है, खासकर जब इसके लिए ईरानी सेना से कोई अनुमति नहीं ली गई थी। अमेरिकी वेबसाइट एक्सियोस ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया कि युद्ध की शुरुआत (28 फरवरी) के बाद यह पहली बार है जब अमेरिकी युद्धपोतों ने बिना इजाजत इस जलडमरूमध्य को पार किया है।

ईरान का पलटवार और कड़ी चेतावनी

अमेरिकी दावे के विपरीत, ईरानी मीडिया ने एक अलग ही तस्वीर पेश की। ईरान की तस्नीम न्यूज ने अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य की ओर बढ़ रहा अमेरिकी विध्वंसक जहाज वापस लौट गया था। तस्नीम के अनुसार, ईरानी सशस्त्र बलों ने अमेरिकी जहाज को रुकने के लिए कड़ी चेतावनी दी, जिसके बाद वह वापस मुड़ गया। ईरान ने यह भी दावा किया कि उसने पाकिस्तानी मध्यस्थों के माध्यम से अमेरिका को चेतावनी दी थी कि अगर जहाज नहीं लौटा तो उसे 30 मिनट के अंदर निशाना बनाया जा सकता था। ईरानी अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि ऐसे कदम इस्लामाबाद में चल रही युद्धविराम वार्ता पर नकारात्मक असर डाल सकते हैं, जहां ईरान और अमेरिका के प्रतिनिधिमंडल एक संवेदनशील समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। ईरान का कहना है कि अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद से उसने होर्मुज स्ट्रेट से समुद्री यातायात को नियंत्रित किया हुआ है, खासकर इजरायल और अमेरिका के जहाजों के लिए उसने इस मार्ग पर प्रतिबंध लगा रखा है।

डोनाल्ड ट्रंप का बयान और भू-राजनीतिक निहितार्थ

इस बीच, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर कई पोस्ट कर स्थिति को और गर्मा दिया। ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका दुनिया पर एहसान करते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य को ‘साफ’ कर रहा है और इसे चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों के लिए ‘खोलने’ जा रहा है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि दुनिया अब अमेरिकी तेल खरीदने की ओर देख रही है, जो कि खाली तेल टैंकरों की बड़ी संख्या के अमेरिका की ओर बढ़ने से स्पष्ट है। ट्रंप ने कहा कि ये टैंकर दुनिया के सबसे बेहतरीन और ‘सबसे मीठे’ तेल को भरने के लिए आ रहे हैं। उन्होंने मीडिया के उन दावों को ‘फेक न्यूज’ करार दिया कि ईरान अपना युद्ध जीत रहा है। इसके विपरीत, ट्रंप ने दावा किया कि ईरान असल में बुरी तरह हार रहा है और उसकी नौसेना, वायुसेना, विमान-रोधी उपकरण, रडार, मिसाइल और ड्रोन बनाने वाली फैक्ट्रियां तबाह हो चुकी हैं। उन्होंने यह भी टिप्पणी की कि ईरान के पुराने नेता अब उनके बीच नहीं रहे।

बातचीत के बीच बढ़ते तनाव का असर

यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम समझौते को लेकर प्रतिनिधिमंडल बातचीत कर रहे हैं। होर्मुज स्ट्रेट में अमेरिकी जहाजों की कथित घुसपैठ और ईरान की कड़ी चेतावनी ने इन शांति वार्ताओं पर सीधे तौर पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि ऐसे उकसावे वाले कदम बातचीत की प्रक्रिया को बाधित कर सकते हैं। चूंकि ईरान ने इजरायल और अमेरिका से जुड़े जहाजों के लिए इस मार्ग को प्रतिबंधित कर रखा है, किसी भी अमेरिकी युद्धपोत का यहां से गुजरना उसकी संप्रभुता और नियंत्रण को सीधी चुनौती है। यह घटना दर्शाती है कि क्षेत्र में तनाव अभी भी अपने चरम पर है और किसी भी छोटे से कदम से भी बड़े संघर्ष का खतरा बना हुआ है, जिससे शांति प्रयासों को गहरा धक्का लग सकता है।

आगे की स्थिति पर नजर

होर्मुज स्ट्रेट की यह घटना क्षेत्र में भू-राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ा सकती है। अमेरिकी जहाजों के गुजरने का दावा और ईरान की जवाबी चेतावनी दोनों देशों के बीच पहले से ही नाजुक संबंधों को और जटिल बना रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय और विशेष रूप से इस्लामाबाद में बातचीत में शामिल मध्यस्थों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वे इस तनाव को कम करें और शांति प्रक्रिया को पटरी पर लाएं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या इस घटना का युद्धविराम वार्ताओं पर दीर्घकालिक असर पड़ता है या दोनों पक्ष किसी समाधान पर पहुंच पाते हैं।

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