‘ऑपरेशन सिंदूर’ जिसमें भारत ने पाकिस्तान को दी थी मात
भारत ने मई 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की शुरुआत की थी। इस ऑपरेशन का पहला चरण बेहद विनाशकारी था, जिसमें भारतीय सेना ने पाकिस्तान स्थित प्रमुख आतंकवादी संगठनों के ठिकानों को निशाना बनाया। इसमें लश्कर-ए-तैयबा का मुख्यालय मुरीदके और जैश-ए-मोहम्मद का मुख्यालय बहावलपुर शामिल थे। इन हमलों ने आतंकी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया।
इसके जवाब में, पाकिस्तानी सेना ने भारत के सैन्य और नागरिक ठिकानों पर हमला करने की एक असफल कोशिश की। भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान के 11 एयरबेसों पर मिसाइल और ड्रोन से ताबड़तोड़ हमले किए, जिससे वहां भारी तबाही मच गई। इस सैन्य कार्रवाई के दौरान पाकिस्तानी सेना को अभूतपूर्व क्षति का सामना करना पड़ा था।
ट्रंप ने कैसे की थी पाकिस्तान की मदद और लिया झूठा श्रेय?
पूरी दुनिया ने सबूतों के साथ देखा कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान पाकिस्तान को कितना गंभीर नुकसान हुआ था। उसकी वायु रक्षा प्रणाली की कलई खुल गई और कई लड़ाकू विमान तो उड़ान भरने से पहले ही जमीन पर मलबे के ढेर में तब्दील हो गए। इसके बावजूद, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का प्रशासन भारत के खिलाफ एक दुष्प्रचार अभियान में शामिल हो गया।
पहले अमेरिकी अधिकारियों के माध्यम से कई भारतीय राफेल विमानों को मार गिराने की भ्रामक खबरें फैलाई गईं। बाद में, ट्रंप ने खुले तौर पर यह दावा करना शुरू कर दिया कि उन्होंने ही भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराया था। भारत ने हर अंतरराष्ट्रीय मंच से ट्रंप के इस दावे को सिरे से खारिज किया। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में स्पष्ट किया कि यह संघर्षविराम पाकिस्तान के गिड़गिड़ाने पर हुआ था और इसमें किसी भी तीसरे पक्ष की कोई भूमिका नहीं थी। इसके बावजूद, ट्रंप आज भी अपने लगभग हर सार्वजनिक भाषण में भारत-पाकिस्तान संघर्षविराम का श्रेय लेते हैं।
ट्रंप ने पाकिस्तानी आर्मी चीफ को बनाया ‘फेवरेट’
ट्रंप का पाकिस्तान के प्रति झुकाव यहीं नहीं रुका। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ समाप्त होने के कुछ ही हफ्तों बाद, उन्होंने पाकिस्तान के तत्कालीन आर्मी चीफ असीम मुनीर (जो तब तक फील्ड मार्शल बन चुके थे) को व्हाइट हाउस में दोपहर के भोजन पर आमंत्रित किया। यह अमेरिकी इतिहास में एक दुर्लभ घटना थी, जब किसी देश के सैन्य प्रमुख को इस तरह व्हाइट हाउस में बुलाया गया हो, खासकर तब जब उस देश में एक नागरिक सरकार भी मौजूद हो।
ट्रंप ने कई सार्वजनिक अवसरों पर असीम मुनीर को अपना ‘फेवरेट फील्ड मार्शल’ तक कहकर संबोधित किया। उन्होंने असीम मुनीर को प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ दूसरी बार भी व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया था। पाकिस्तान ने भी ट्रंप की चापलूसी में कोई कसर नहीं छोड़ी और उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए भी नामित कर दिया।
अमेरिका और ईरान के बीच क्यों बढ़ा तनाव?
अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ 28 फरवरी को सैन्य हमले शुरू किए थे, जिसके बाद 8 अप्रैल को संघर्षविराम पर सहमति बनी। ट्रंप का शुरुआती अनुमान था कि ईरान एक या दो सप्ताह के भीतर ही घुटने टेक देगा, लेकिन उनका यह आकलन पूरी तरह गलत साबित हुआ। ईरान ने अपनी सैन्य ताकत का जोरदार प्रदर्शन करते हुए न केवल मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमले किए, बल्कि उसके सहयोगी देशों के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों को भी निशाना बनाया।
इन हमलों से अमेरिका के सहयोगी देश परेशान हो गए। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से खाड़ी देशों की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी, जिससे अमेरिका पर युद्धविराम के लिए दबाव काफी बढ़ गया।
ट्रंप को आखिर क्यों पड़ी पाकिस्तान की जरूरत?
बढ़ते दबाव के बीच ट्रंप ने ईरान को धमकियां देना शुरू किया, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। अंत में, थक-हारकर ट्रंप प्रशासन को पाकिस्तान की मदद लेनी पड़ी। पाकिस्तान, ईरान का पड़ोसी और एक मुस्लिम राष्ट्र होने के साथ-साथ अमेरिका का करीबी भी है। पाकिस्तान और ईरान के बीच लगभग 1000 किलोमीटर की सीमा लगती है। विडंबना यह है कि यही ट्रंप थे जिन्होंने अपने पहले कार्यकाल में अफगानिस्तान के मुद्दे पर पाकिस्तान पर आरोप लगाया था कि उसने अमेरिका को “झूठ और धोखे के सिवा कुछ नहीं दिया।” लेकिन इस बार बदले हुए हालात में उन्होंने ईरान के साथ संघर्षविराम के लिए पाकिस्तान पर दबाव डाला।
पाकिस्तान की असल भूमिका: मध्यस्थ या सिर्फ संदेशवाहक?
वास्तव में, पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच कोई मध्यस्थता नहीं की, बल्कि उसने केवल एक संदेशवाहक या ‘डाकिया’ के रूप में काम किया। उसका काम अमेरिका के संदेशों को ईरान तक पहुंचाना और ईरान के संदेशों को अमेरिका तक लाना था। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर किए गए एक पोस्ट ने भी इस प्रक्रिया में पाकिस्तान की सीमित भूमिका को उजागर कर दिया।
ईरान और अमेरिका के बीच युद्धविराम की घोषणा से कुछ घंटे पहले, शहबाज शरीफ ने X पर एक पोस्ट किया, जिसमें युद्धविराम का एक शुरुआती मसौदा था। इस मसौदे में लिखा था: ‘मसौदा – X पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री का संदेश’। इस लाइन से यह स्पष्ट हो गया कि यह पोस्ट किसी बाहरी शक्ति द्वारा तैयार किया गया था। बाद में, ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की एक रिपोर्ट ने इस बात की पुष्टि की कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री द्वारा पोस्ट किए जाने से पहले व्हाइट हाउस ने इस संदेश को अपनी “मंजूरी” दी थी, जिससे पाकिस्तान की भूमिका की पोल खुल गई।
