जब अमेरिकी युद्धपोतों ने सोमवार सुबह ओमान की खाड़ी में अपनी तोपों का मुंह ईरानी तटों की ओर किया, तो वाशिंगटन के नीति निर्माताओं को लगा था कि उनका आक्रामक सैन्य दबाव तेहरान को घुटने टेकने पर मजबूर कर देगा। लेकिन इसके ठीक विपरीत, ईरानी नेतृत्व ने होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जो जवाबी रणनीति पेश की है, उसने पेंटागन के साथ-साथ वॉल स्ट्रीट के भी पसीने छुड़ा दिए हैं। वाशिंगटन की नाकेबंदी की धमकियों का जवाब मिसाइलों से देने के बजाय, ईरान ने एक ऐसी अभूतपूर्व कूटनीतिक और आर्थिक शर्त रख दी है जो सीधे तौर पर अमेरिकी वैश्विक शक्ति की सबसे बड़ी जीवन रेखा पर घातक प्रहार करती है।
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के ऐतिहासिक आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि दुनिया का लगभग 21 मिलियन बैरल कच्चा तेल हर दिन इस संकरे जलमार्ग से गुजरता है, जो वैश्विक खपत का 20 प्रतिशत से अधिक है। इस जीवन रेखा को नियंत्रित करने की होड़ में, पश्चिमी मीडिया इसे केवल एक पारंपरिक सैन्य गतिरोध के रूप में प्रचारित कर रहा है, जबकि असल खेल एक बहुत ही उच्च-स्तरीय वित्तीय बिसात पर खेला जा रहा है। तेहरान ने अत्यंत कड़े शब्दों में यह स्पष्ट कर दिया है कि जब तक उसकी नई रणनीतिक शर्तें नहीं मानी जातीं, तब तक दुनिया का सबसे व्यस्त ऊर्जा मार्ग पश्चिमी देशों के व्यापारिक जहाजों के लिए एक अभेद्य और खतरनाक समुद्री क्षेत्र बना रहेगा।
मगर असली कहानी इस सैन्य तनातनी से कहीं आगे जाती है। ईरान द्वारा रखी गई इस शर्त ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को एक ऐसे धर्मसंकट में डाल दिया है, जहां पीछे हटना राजनीतिक आत्महत्या के समान होगा और आगे बढ़ना पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को तीसरे विश्व युद्ध या एक गहरी मंदी की आग में झोंक देगा।
तोपों की छाया में व्यापार: खाड़ी की वो खामोशी जो एक बड़े तूफान का इशारा है
खाड़ी का इतिहास बताता है कि जब भी महाशक्तियों ने अपनी नौसेना के बल पर इस क्षेत्र को नियंत्रित करने की कोशिश की है, परिणाम हमेशा विनाशकारी रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप की आक्रामक नाकेबंदी का उद्देश्य ईरान के ऊर्जा निर्यात को पूरी तरह से पंगु बनाना और उसे आर्थिक रूप से इतना कमजोर कर देना था कि वह बिना किसी शर्त के अमेरिकी मांगों के आगे झुक जाए। इस ‘मैक्सिमम प्रेशर’ रणनीति के तहत अमेरिकी कमांडरों ने खाड़ी के पानी में जंगी जहाजों का जमावड़ा लगा दिया, यह मानकर कि डर का माहौल तेहरान के सत्ता प्रतिष्ठान में दरार डाल देगा।
लेकिन ईरान ने जिस तरह से इस संकट का जवाब दिया है, वह रणनीतिक धैर्य और भू-राजनीतिक चतुराई का एक अचूक उदाहरण है। ईरानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने अमेरिकी युद्धपोतों से सीधा टकराने के बजाय, जलडमरूमध्य के उन संकरे ‘चोकपॉइंट्स’ पर अपना नियंत्रण और सख्त कर दिया है, जहां से बड़े सुपरटैंकर गुजरते हैं। यह सिर्फ एक सैन्य पैंतरेबाज़ी नहीं थी, बल्कि दुनिया को यह याद दिलाने का एक स्पष्ट संदेश था कि अमेरिका चाहे जितनी भी नाकेबंदी कर ले, होर्मुज के भूगोल और भौतिक नियंत्रण पर अंतिम अधिकार ईरान का ही है।
इस तनातनी ने अंतरराष्ट्रीय शिपिंग उद्योग में एक ऐसा खौफ पैदा कर दिया है जिसकी मिसाल पिछले कई दशकों में नहीं मिलती। प्रमुख समुद्री बीमा कंपनियों ने खाड़ी से गुजरने वाले जहाजों के लिए युद्ध-जोखिम प्रीमियम में इतनी भारी वृद्धि कर दी है कि कई छोटी शिपिंग कंपनियों ने इस मार्ग से पूरी तरह किनारा कर लिया है। यह एक ऐसी खामोशी है जो किसी भी क्षण एक भयंकर आर्थिक तूफान में तब्दील हो सकती है, क्योंकि जब दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति के मुख्य दरवाजे पर ताला लटक रहा हो, तो उसका सीधा असर लंदन से लेकर टोक्यो तक के शेयर बाजारों पर पड़ना तय है।
असली दांव: जलमार्ग का नियंत्रण नहीं, डॉलर के ताबूत में आखिरी कील
पश्चिमी विश्लेषकों और मुख्यधारा के समाचार आउटलेट्स ने ईरान की इस जवाबी कार्रवाई का जो विश्लेषण किया है, उसमें उन्होंने सबसे बड़े और विनाशकारी पहलू को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है। दुनिया भर में यह चर्चा है कि ईरान प्रतिबंधों को हटाने या अमेरिकी सैन्य वापसी की मांग कर रहा है, लेकिन सतह के नीचे छिपा असली सच यह है कि तेहरान ने इस संकट का इस्तेमाल ‘डी-डॉलराइजेशन’ (De-dollarization) को एक क्रूर गति देने के लिए किया है। ईरान की यह बड़ी शर्त सिर्फ सैन्य नहीं है; वह चाहता है कि होर्मुज से गुजरने वाले ऊर्जा व्यापार और किसी भी प्रकार के ‘सुरक्षा पारगमन’ का निपटान अब अमेरिकी डॉलर के बजाय युआन, रूबल या ब्रिक्स द्वारा समर्थित किसी अन्य मुद्रा में किया जाए।
इस एक चाल ने पूरी बाजी पलट दी है। दशकों से अमेरिका की वैश्विक शक्ति इस ‘पेट्रोडॉलर’ व्यवस्था पर टिकी है कि दुनिया भर में कच्चे तेल का व्यापार केवल डॉलर में होगा, जिससे अमेरिकी मुद्रा की कृत्रिम मांग बनी रहती है और वाशिंगटन असीमित कर्ज ले पाता है। ईरान अब सीधे तौर पर इस व्यवस्था की जड़ों में तेजाब डाल रहा है। यदि बीजिंग और मॉस्को जैसे सहयोगी पर्दे के पीछे से इस ईरानी मांग का समर्थन करते हैं—जिसकी पूरी संभावना है—तो वाशिंगटन के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी हो जाएगी जिसका समाधान उसकी कोई भी विमानवाहक पोत (Aircraft Carrier) नहीं कर सकती।
इस वित्तीय युद्ध के परिणाम किसी भी सैन्य संघर्ष से ज्यादा खौफनाक होंगे। यदि ईरान अपनी इस शर्त पर अड़ा रहता है और चीन जैसे बड़े खरीददार इस नई व्यवस्था के तहत व्यापार करने लगते हैं, तो अमेरिकी डॉलर का वैश्विक प्रभुत्व रातों-रात ढहने लगेगा। वाशिंगटन के नीति निर्माता इस तथ्य को भली-भांति समझते हैं कि यदि तेल के व्यापार से डॉलर को बाहर कर दिया गया, तो अमेरिका के भीतर बेलगाम मुद्रास्फीति आएगी और डॉलर की क्रय शक्ति औंधे मुंह गिर जाएगी। इस प्रकार, ईरान ने होर्मुज की भौगोलिक संकीर्णता का इस्तेमाल करते हुए अमेरिका की सबसे बड़ी आर्थिक कमजोरी पर सीधा प्रहार किया है।
तीन रास्ते और वाशिंगटन का धर्मसंकट: क्या झुकना ही एकमात्र विकल्प है?
इस अभूतपूर्व कूटनीतिक और आर्थिक घेराबंदी ने वाशिंगटन के सामने जो रणनीतिक परिदृश्य खड़े किए हैं, वे सभी अत्यधिक जोखिम भरे हैं। पहला परिदृश्य यह है कि अमेरिकी प्रशासन अपने अहंकार और घरेलू राजनीतिक दबाव में आकर ईरान की इस मांग को सिरे से खारिज कर दे और होर्मुज में सीधे सैन्य बल का प्रयोग करे। यदि अमेरिका ईरानी तटीय ठिकानों या नौसैनिक अड्डों पर हमला करता है, तो ईरान तुरंत जलडमरूमध्य को पूरी तरह से ब्लॉक कर देगा, जिससे रातों-रात कच्चे तेल की कीमतें 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल के ऐतिहासिक स्तर को पार कर जाएंगी और पूरी दुनिया एक गहरे आर्थिक अवसाद में डूब जाएगी।
दूसरा परिदृश्य कूटनीतिक समझौते का है, जो अमेरिका के लिए एक मौन आत्मसमर्पण के समान होगा। यदि यूरोपीय सहयोगी देश, जो ऊर्जा संकट से सबसे ज्यादा डरे हुए हैं, अमेरिका पर दबाव डालते हैं कि वह किसी भी तरह इस गतिरोध को खत्म करे, तो वाशिंगटन को ईरान की कुछ शर्तों को परोक्ष रूप से मानना पड़ सकता है। इस स्थिति में ईरान गैर-डॉलर व्यापार के अपने एजेंडे में सफल हो जाएगा। यह अमेरिका के लिए एक रणनीतिक हार होगी, क्योंकि यह दुनिया को स्पष्ट संदेश देगा कि वाशिंगटन अब अपनी शर्तों पर वैश्विक नौवहन और वित्तीय नियमों को लागू करने में पूरी तरह सक्षम नहीं है।
तीसरा और सबसे जटिल परिदृश्य एक लंबे समय तक चलने वाले ‘ग्रे-जोन’ संघर्ष का है। इस स्थिति में न तो पूर्ण युद्ध होगा और न ही कोई समझौता, बल्कि दोनों पक्ष एक-दूसरे को थकाने की कोशिश करेंगे। जहाजों को एस्कॉर्ट करने, छिटपुट झड़पों और साइबर हमलों का एक अंतहीन सिलसिला शुरू हो जाएगा। भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह सबसे बुरी स्थिति होगी, क्योंकि ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता उनके घरेलू विकास को रोक देगी और उन्हें अमेरिका तथा उभरते यूरेशियन गुट (रूस-चीन-ईरान) के बीच किसी एक को चुनने के असहनीय दबाव का सामना करना पड़ेगा।
एक साम्राज्य का पतन और नए भू-राजनीतिक युग का खूनी सूर्योदय
ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने के लिए जो शर्त विश्व पटल पर रखी है, वह महज एक कूटनीतिक सौदेबाजी नहीं है; यह एक मरती हुई एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था के खिलाफ एक खुली बगावत का उद्घोष है। वाशिंगटन ने लंबे समय तक यह भ्रम पाले रखा था कि वह अपनी नौसैनिक सर्वोच्चता और प्रतिबंधों की छड़ी के दम पर आधी दुनिया को अपने आर्थिक ढांचे का गुलाम बनाए रख सकता है। लेकिन तेहरान ने यह साबित कर दिया है कि जब एक देश खोने के लिए कुछ नहीं के बिंदु पर पहुंच जाता है, तो वह महाशक्तियों के बनाए गए खेल के नियम ही बदल देता है।
आज जो कुछ भी खाड़ी के उबलते पानी में घटित हो रहा है, वह स्पष्ट रूप से इस बात का संकेत है कि ‘गनबोट डिप्लोमेसी’ (Gunboat Diplomacy) के दिन अब लद चुके हैं। अमेरिका भले ही अपने विमानवाहक पोतों को खाड़ी में तैनात कर ले, लेकिन वह उस भू-आर्थिक सुनामी को नहीं रोक सकता जो इस जलमार्ग से उठकर पूरी दुनिया के वित्तीय तंत्र को निगलने के लिए तैयार है। यह गतिरोध इतिहास के पन्नों में एक ऐसी घटना के रूप में दर्ज होगा, जहां एक क्षेत्रीय शक्ति ने अपनी भौगोलिक स्थिति का इस्तेमाल करते हुए एक वैश्विक साम्राज्य के वित्तीय आधार को हिला कर रख दिया। अब यह तय है कि होर्मुज का यह संकट जब भी शांत होगा, दुनिया की भू-राजनीतिक धुरी हमेशा के लिए बदल चुकी होगी।
