बिना PhD प्रोफेसर बनीं मालिनी अवस्थी और वह नीतिगत बदलाव जो भारतीय शिक्षा का ढांचा बदल देगा

चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में लोक गायिका मालिनी अवस्थी की नियुक्ति सिर्फ एक सेलिब्रिटी का सम्मान नहीं है, बल्कि यह भारतीय अकादमिक जगत में एक ऐसे ढांचागत बदलाव की शुरुआत है जो पारंपरिक डिग्री और जमीनी अनुभव के बीच की पुरानी लकीरों को हमेशा के लिए मिटा रहा है। सतह पर यह कदम शिक्षा को रोजगार से जोड़ने की एक शानदार पहल दिखता है, लेकिन गहराई में यह उन हजारों शोधार्थियों के लिए एक असहज करने वाला सवाल भी खड़ा करता है जो वर्षों तक नेट और पीएचडी की भट्ठी में तपते हैं। 

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विश्वविद्यालयों के गलियारों में लंबे समय से एक सख्त पदानुक्रम रहा है। एक छात्र दशकों तक अध्ययन करता है, शोध पत्र लिखता है और पीएचडी की कठिन प्रक्रिया से गुजरता है, तब जाकर वह प्रोफेसर की कुर्सी तक पहुंचता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने इस स्थापित व्यवस्था को जड़ से हिला दिया है। प्रोफेसर ऑफ प्रैक्टिस योजना के तहत अब अकादमिक अनिवार्यताओं को दरकिनार कर दिया गया है। इस नई नीति का सबसे प्रमुख और ताजा उदाहरण मेरठ का चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय है।

कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला की अध्यक्षता में हुई हालिया कार्य परिषद की बैठक में पद्मश्री से सम्मानित लोक गायिका मालिनी अवस्थी को प्रोफेसर नियुक्त किया गया है। उनके पास दशकों का मंचीय अनुभव और सांस्कृतिक ज्ञान है, जो अब सीधे छात्रों तक पहुंचेगा। यह बदलाव राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उस विजन का हिस्सा है जो किताबी ज्ञान से परे जाकर कौशल आधारित शिक्षा पर जोर देता है।

कक्षाओं में इंडस्ट्री और कला जगत के दिग्गजों की सीधी एंट्री एक नई बहस को जन्म दे चुकी है। एक तरफ इसे शिक्षा के व्यावसायीकरण और नवाचार की दिशा में मास्टरस्ट्रोक माना जा रहा है। दूसरी तरफ अकादमिक विश्लेषक इस बात पर चिंता जता रहे हैं कि क्या केवल कार्यानुभव किसी को एक अच्छा शिक्षक बना सकता है।

अकादमिक योग्यता और जमीनी अनुभव के बीच दशकों पुरानी दीवार का ढहना

भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली लंबे समय से सिद्धांत और व्यवहार के बीच की खाई से जूझती रही है। छात्र किताबें पढ़कर डिग्रियां तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन जब वे बाजार में उतरते हैं तो व्यावहारिक कौशल की कमी उन्हें बेरोजगार छोड़ देती है। यूजीसी ने इस मर्ज के इलाज के रूप में विशेषज्ञों की सीधी भर्ती का यह मॉडल तैयार किया है।

इस नीति के तहत किसी भी ऐसे विशेषज्ञ को सीधे प्रोफेसर के पद पर नियुक्त किया जा सकता है जिसके पास अपने क्षेत्र में कम से कम 15 वर्षों का ठोस अनुभव हो। यह क्षेत्र कला, मीडिया, विज्ञान, या उद्योग कुछ भी हो सकता है। मालिनी अवस्थी की नियुक्ति इसी श्रेणी के तहत हुई है। वह छात्रों को केवल सुर और ताल नहीं सिखाएंगी, बल्कि कला के क्षेत्र में रोजगार, मंच प्रबंधन और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के व्यावहारिक गुर भी देंगी।

दिलचस्प बात यह है कि जिस बैठक में मालिनी अवस्थी को प्रोफेसर नियुक्त किया गया, उसी बैठक में विश्वविद्यालय ने 59 शोधार्थियों को पीएचडी की मंजूरी भी दी। एक ही कमरे में दो अलग-अलग शैक्षणिक युगों का यह संगम अपने आप में एक ऐतिहासिक क्षण था। एक तरफ पारंपरिक शोध का सम्मान हो रहा था, तो दूसरी तरफ अनुभव आधारित शिक्षा के लिए दरवाजे खोले जा रहे थे।

डिग्रियों की दौड़ बनाम कौशल का बाजार और विश्वविद्यालयों पर मंडराता नया खतरा

सतह पर यह नीति एक आदर्श समाधान प्रतीत होती है। छात्रों को इंटर्नशिप, प्लेसमेंट और असली दुनिया की चुनौतियों का सीधा ज्ञान मिलेगा। शिक्षाविदों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इस पूरी बहस में वह पहलू नजरअंदाज किया जा रहा है जो अकादमिक उत्कृष्टता की रीढ़ है। शिक्षा देना केवल अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना नहीं है, बल्कि यह एक विशिष्ट कौशल है।

एक बेहतरीन गायक या एक सफल उद्योगपति जरूरी नहीं कि एक प्रभावी शिक्षक भी हो। पीएचडी की प्रक्रिया केवल एक डिग्री नहीं देती, बल्कि वह शोध की कार्यप्रणाली, विश्लेषण की क्षमता और शैक्षणिक धैर्य सिखाती है। जब विश्वविद्यालयों में बिना अकादमिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की सीधी एंट्री होगी, तो शोध की गुणवत्ता पर इसका सीधा असर पड़ना तय है। इसके अलावा, हजारों युवा हर साल परीक्षा पास करने और प्रोफेसर बनने का सपना लेकर विश्वविद्यालयों में दाखिला लेते हैं।

वरिष्ठ अकादमिक समीक्षक इस नीति के संभावित दुरुपयोग की आशंका भी जता रहे हैं। बिना स्पष्ट और पारदर्शी चयन प्रक्रिया के, यह योजना विश्वविद्यालयों में वैचारिक या राजनीतिक पसंद के आधार पर नियुक्तियों का एक आसान रास्ता बन सकती है। अनुभव का मूल्यांकन कैसे होगा और 15 साल के काम की प्रामाणिकता कौन तय करेगा, इन सवालों के जवाब अभी दिशा-निर्देशों में बहुत स्पष्ट नहीं हैं।

यहीं पर भारतीय शिक्षा प्रणाली का सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। हम एक तरफ अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में अपने विश्वविद्यालयों को ऊपर देखना चाहते हैं, जहां शोध पत्रों और फैकल्टी का बड़ा महत्व होता है। वहीं हम दूसरी तरफ ऐसे विशेषज्ञों को सिस्टम में ला रहे हैं जिनका ध्यान अकादमिक शोध के बजाय सिर्फ व्यावहारिक प्रशिक्षण पर होगा।

क्या यह नई व्यवस्था उच्च शिक्षा को बाजार के हवाले कर देगी

अगले कुछ वर्षों में भारतीय विश्वविद्यालयों का स्वरूप पूरी तरह से बदलने वाला है। इस नीति के लागू होने के बाद दो संभावित परिदृश्य उभर कर सामने आते हैं। पहला परिदृश्य बेहद सकारात्मक है, जहां पारंपरिक प्रोफेसर और इंडस्ट्री विशेषज्ञ मिलकर एक आधुनिक शिक्षा प्रणाली तैयार करेंगे।

इस ढांचे में थ्योरी और प्रैक्टिकल का सही संतुलन होगा। छात्र कक्षाओं में जो पढ़ेंगे, उसे विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में असली दुनिया में लागू करना सीखेंगे। इससे भारत में नवाचार को एक अभूतपूर्व गति मिल सकती है। छात्र केवल नौकरी मांगने वाले नहीं, बल्कि रोजगार पैदा करने वाले बनेंगे।

दूसरा परिदृश्य चिंताजनक है। अगर इन नियुक्तियों में अकादमिक संतुलन नहीं रखा गया, तो विश्वविद्यालय केवल ट्रेनिंग सेंटर बनकर रह जाएंगे। वहां से निकलने वाले छात्र किसी कंपनी के लिए तो उपयोगी होंगे, लेकिन उनमें स्वतंत्र आलोचनात्मक सोच और गहन शोध की क्षमता खत्म हो जाएगी। शिक्षा का मूल उद्देश्य केवल रोजगार देना नहीं है, बल्कि एक जागरूक समाज का निर्माण करना भी है।

एक ऐसे चौराहे पर खड़ी शिक्षा व्यवस्था जहां डिग्रियां अपना एकाधिकार खो रही हैं

यूजीसी का यह कदम भारतीय शिक्षा के इतिहास में एक बड़े मील के पत्थर के रूप में दर्ज होगा। मालिनी अवस्थी जैसी हस्तियों का विश्वविद्यालयों से जुड़ना छात्रों के लिए निश्चित रूप से एक दुर्लभ और मूल्यवान अवसर है। उनके अनुभव से मिलने वाली व्यावहारिक समझ को किसी किताब में नहीं पढ़ा जा सकता।

बहरहाल असली चुनौती इस नीति के क्रियान्वयन में छिपी है। नीति निर्माताओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि अनुभव को तरजीह देने की इस प्रक्रिया में अकादमिक कठोरता और शोध की संस्कृति से कोई समझौता न हो। विश्वविद्यालयों को यह तय करना होगा कि बाहरी विशेषज्ञ पारंपरिक शिक्षकों के विकल्प नहीं हैं, बल्कि उनके पूरक हैं।

भारत को ऐसे जानकारों की आवश्यकता है जो छात्रों को भविष्य के लिए तैयार कर सकें, लेकिन इसके साथ ही हमें उन शोधकर्ताओं की भी उतनी ही जरूरत है जो ज्ञान की नई सीमाएं तलाशते हैं। ज्ञान और अनुभव के इस नए गठजोड़ को पूरी सावधानी से साधना होगा। ऐसा न होने पर हम डिग्रियों की दौड़ से निकलकर एक ऐसी व्यवस्था में फंस जाएंगे जहां शिक्षा का मूल उद्देश्य ही बाजार की भेंट चढ़ जाएगा।

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