होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिकी पाबंदियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर कर दी

होर्मुज जलडमरूमध्य में अमेरिकी रणनीतिक घेराबंदी को केवल कच्चे तेल के खेल तक सीमित समझना एक भारी भूल है। इसकी असली कीमत भारतीय मध्यम वर्ग अपनी रसोई और दैनिक जरूरतों के बढ़े हुए बिलों के रूप में चुकाने जा रहा है।

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वैश्विक कूटनीति के मानचित्र पर ओमान और ईरान के बीच स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य की चौड़ाई भले ही कुछ किलोमीटर हो। इसके बावजूद दुनिया भर के शेयर बाजारों और अर्थव्यवस्थाओं की धड़कनें इसी समुद्री रास्ते से नियंत्रित होती हैं। वैश्विक तेल व्यापार का लगभग बीस प्रतिशत हिस्सा प्रतिदिन इस संकरे जलमार्ग से होकर गुजरता है। वाशिंगटन द्वारा इस क्षेत्र में लगाई गई नई पाबंदियां और निगरानी तंत्र ने भू-राजनीतिक तापमान को अचानक बढ़ा दिया है।

अक्सर आम धारणा यह होती है कि खाड़ी क्षेत्र में किसी भी विवाद का सीधा असर केवल पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ता है। नीति निर्माताओं के लिए यह संकट कहीं अधिक गहरा और बहुआयामी है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है और इसका एक बहुत बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से इसी मार्ग के जरिए आता है। जब भी इस समुद्री मार्ग पर कोई प्रतिबंध या सैन्य हलचल होती है, तो पूरी अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला लड़खड़ाने लगती है।

भारतीय रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के अधिकारी ऐसे बाहरी झटकों को लेकर हमेशा सतर्क रहते हैं। कच्चे तेल की कीमतों में एक डॉलर की वृद्धि भी भारत के आयात बिल में हजारों करोड़ रुपये का इजाफा कर देती है। ऊर्जा सुरक्षा से परे जाकर देखें तो इन प्रतिबंधों ने एक ऐसी आर्थिक श्रृंखला को ट्रिगर किया है, जिसका सीधा प्रभाव हर भारतीय नागरिक की क्रय शक्ति पर पड़ने वाला है।

कच्चे तेल की आवाजाही पर अमेरिकी नियंत्रण का दशकों पुराना भू-राजनीतिक खेल

अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार में होर्मुज हमेशा से एक संवेदनशील नस रहा है। अमेरिका दशकों से इस क्षेत्र में अपनी नौसैनिक उपस्थिति बनाए हुए है ताकि ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके। हालिया प्रतिबंधों की प्रकृति थोड़ी अलग है और यह सीधे तौर पर प्रतिबंधात्मक आर्थिक कूटनीति का हिस्सा है। वाशिंगटन का उद्देश्य अपने रणनीतिक विरोधियों पर दबाव बनाना है। इस प्रक्रिया में भारत जैसे तटस्थ व्यापारिक भागीदारों को भी अप्रत्यक्ष नुकसान उठाना पड़ रहा है।

अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों के लिए इस क्षेत्र से गुजरना अब पहले से कहीं अधिक जोखिम भरा हो गया है। जब भी इस तरह के भू-राजनीतिक तनाव पनपते हैं, तो समुद्री बीमा कंपनियां वाणिज्यिक जहाजों पर अतिरिक्त शुल्क लगा देती हैं। इसे व्यावसायिक भाषा में वॉर रिस्क प्रीमियम कहा जाता है और यह रातों-रात परिवहन लागत को दोगुना कर सकता है। मालवाहक जहाज चाहे कच्चे तेल के हों या अन्य जरूरी वस्तुओं के, उन्हें यह अतिरिक्त कीमत चुकानी ही पड़ती है।

परिवहन लागत में यह अप्रत्याशित वृद्धि सीधे तौर पर आयातित माल की अंतिम कीमत में जुड़ जाती है। भारतीय बंदरगाहों पर पहुंचने वाले माल का किराया बढ़ने से आयातकों का मार्जिन सिकुड़ जाता है। इसके बाद कंपनियां इस बढ़े हुए खर्च का बोझ सीधे अंतिम उपभोक्ताओं पर डाल देती हैं। यही वह बिंदु है जहां से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति एक आम आदमी के घरेलू बजट को बिगाड़ना शुरू कर देती है।

पेट्रोल पंप से शुरू होकर आपकी डाइनिंग टेबल तक पहुंचने वाली महंगाई की अदृश्य लहर

वाशिंगटन के हालिया नीतिगत फैसलों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के उस हिस्से पर प्रहार किया है, जिसकी चर्चा मुख्यधारा में कम ही होती है। उर्वरक उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चा माल और प्राकृतिक गैस का भारी आयात खाड़ी देशों से होता है। अगर ऊर्जा और परिवहन की लागत बढ़ती है, तो यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी आसमान छूने लगती हैं। सरकार को या तो सब्सिडी का बोझ बढ़ाना पड़ता है या फिर किसानों पर इसका भार डालना पड़ता है।

कृषि क्षेत्र में लागत बढ़ने का सीधा मतलब है कि अनाज, सब्जियां और दालें महंगी हो जाएंगी। परिवहन महंगा होने के कारण देश के भीतर भी ट्रकों से होने वाली ढुलाई की लागत बढ़ जाती है। रोजमर्रा के इस्तेमाल का सामान बनाने वाली कंपनियां यानी एफएमसीजी सेक्टर भी इस दबाव से अछूता नहीं रहता है। साबुन से लेकर पैकेज्ड फूड तक हर उत्पाद की पैकेजिंग और वितरण में पेट्रोलियम उत्पादों का सीधा इस्तेमाल होता है।

लॉजिस्टिक्स क्षेत्र के जानकारों का स्पष्ट मत है कि आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली ऐसी बाधाएं मुद्रास्फीति को बहुत तेजी से बढ़ाती हैं। केंद्रीय बैंक के लिए ऐसी महंगाई को ब्याज दरें बढ़ाकर नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाता है। यह एक स्ट्रक्चरल शॉक है जिसे अर्थशास्त्र की भाषा में सप्लाई-साइड इन्फ्लेशन कहा जाता है। आम उपभोक्ता को यह समझ नहीं आता कि उसकी थाली का भोजन वाशिंगटन के किसी नीतिगत फैसले के कारण महंगा हो गया है।

रसायन और प्लास्टिक उद्योग भी इसी कच्चे तेल के उप-उत्पादों पर पूरी तरह निर्भर हैं। इन उद्योगों में आने वाली कोई भी मंदी या महंगाई सीधे तौर पर विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर को प्रभावित करती है। अगर विनिर्माण धीमा पड़ता है तो रोजगार के नए अवसरों का सृजन भी रुक जाता है। एक छोटी सी भौगोलिक पट्टी पर लगी पाबंदी इस तरह पूरी अर्थव्यवस्था को एक चक्रव्यूह में फंसा देती है।

क्या नई दिल्ली इस वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के चक्रव्यूह को भेद पाएगी

अगले कुछ महीनों में भारत सरकार के सामने इस संकट से निपटने के लिए दो स्पष्ट परिदृश्य उभर कर सामने आ सकते हैं। पहले परिदृश्य में अमेरिका इन प्रतिबंधों को और कड़ा कर सकता है। अगर ऐसा होता है, तो भारत को अपने आयात के लिए वैकल्पिक और लंबे समुद्री रास्तों की तलाश करनी होगी। अफ्रीकी तट के चक्कर लगाकर आने वाले जहाजों में समय और पैसा दोनों अधिक लगता है। इस स्थिति में महंगाई का एक लंबा दौर भारत को झेलना पड़ सकता है।

दूसरे परिदृश्य में नई दिल्ली अपनी कूटनीतिक ताकत का इस्तेमाल करके अमेरिका से कुछ विशेष छूट हासिल कर सकती है। अतीत में भी भारत ने ईरान से तेल आयात के मामले में वाशिंगटन से ऐसी रणनीतिक छूट सफलतापूर्वक प्राप्त की थी। वर्तमान भू-राजनीतिक माहौल में ऐसी रियायत हासिल करना कूटनीतिक रूप से एक बेहद चुनौतीपूर्ण कार्य होगा। इसके लिए भारत को वैश्विक मंचों पर कुछ समझौतावादी कदम उठाने पड़ सकते हैं।

रणनीतिक मामलों के जानकार मानते हैं कि भारत को अपनी ऊर्जा टोकरी में विविधता लाने की तत्काल आवश्यकता है। रूस से सस्ते तेल का आयात एक अल्पकालिक राहत जरूर है, लेकिन दीर्घकालिक सुरक्षा के लिए यह पर्याप्त नहीं है। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की ओर तेजी से कदम बढ़ाना और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का विस्तार करना ही एकमात्र स्थायी समाधान नजर आता है। भारत को अपनी समुद्री सुरक्षा रणनीति में भी वाणिज्यिक हितों की रक्षा को प्राथमिकता देनी होगी।

भूमंडलीकरण के दौर में एक दूरस्थ जलसंधि कैसे तय कर रही है राष्ट्र का भविष्य

होर्मुज का यह संकट भारत के लिए एक बहुत बड़ा सबक है। आर्थिक महाशक्ति बनने का सपना देखने वाले किसी भी देश के लिए अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित रखना सबसे पहली शर्त होती है। हम एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था में जी रहे हैं जहां एक महाद्वीप की घटनाएं दूसरे महाद्वीप के बाजारों को रातों-रात अस्थिर कर सकती हैं। भारत की रणनीतिक स्वायत्तता तब तक अधूरी है, जब तक हमारी अर्थव्यवस्था किसी बाहरी जलमार्ग पर इतनी गहराई से निर्भर है।

इस पूरे प्रकरण ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्ध केवल हथियारों से नहीं लड़े जाते हैं। आपूर्ति श्रृंखला को रोकना, बीमा दरों को बढ़ाना और व्यापारिक मार्गों को असुरक्षित बनाना 21वीं सदी के सबसे घातक आर्थिक हथियार हैं। भारतीय नीति निर्माताओं को अब केवल मुद्रास्फीति के आंकड़ों को नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों के राजनीतिक तापमान को भी बारीकी से मापना होगा। एक राष्ट्र की असली ताकत केवल उसके विदेशी मुद्रा भंडार में नहीं, बल्कि ऐसे बाहरी झटकों को सहने की उसकी क्षमता में निहित होती है।

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