कजाकिस्तान भारत को देगा भारी मात्रा में यूरेनियम, ऐतिहासिक परमाणु समझौते को मिली मंजूरी, चीन को झटका

दुनिया के सबसे बड़े यूरेनियम आपूर्तिकर्ता कजाकिस्तान ने भारत के साथ एक ऐतिहासिक परमाणु समझौते को मंजूरी दे दी है। देश की सरकारी कंपनी 'कजाटोमप्रोम' अब भारत को कई वर्षों तक परमाणु ऊर्जा के लिए यूरेनियम की आपूर्ति करेगी। कंपनी के शेयरधारकों ने एक असाधारण बैठक में इस बड़े और दीर्घकालिक अनुबंध पर मुहर लगा दी है, जिससे भारत के परमाणु संयंत्रों के लिए ईंधन की निर्बाध आपूर्ति का रास्ता साफ हो गया है।

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एक विशालकाय सौदे को मिली मंजूरी

कजाकिस्तान की राष्ट्रीय परमाणु कंपनी ‘कजाटोमप्रोम’ (Kazatomprom) ने इस संबंध में एक आधिकारिक घोषणा जारी की है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत को यूरेनियम बेचने के इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर फैसला लेने के लिए कजाटोमप्रोम के शेयरधारकों के बीच एक असाधारण आम बैठक (EGM) आयोजित की गई थी। इस बैठक में भारत के साथ एक विशालकाय सौदे को भारी बहुमत से मंजूरी दे दी गई।

इस सौदे के तहत, भारत के परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) के अंतर्गत आने वाले ‘खरीद और भंडार निदेशालय’ (Directorate of Purchase & Stores – DPS) को प्राकृतिक यूरेनियम सांद्रण (natural uranium concentrates) बेचने के लिए एक लंबे समय का अनुबंध किया गया है। यह समझौता भारत की परमाणु ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक मील का पत्थर माना जा रहा है।

शेयरधारकों का मिला जबरदस्त समर्थन

यह सौदा इतना बड़ा है कि इसका मूल्य कजाटोमप्रोम की कुल संपत्ति के 50% से भी अधिक है। कजाकिस्तान के कानून के अनुसार, इतने बड़े मूल्य के किसी भी सौदे के लिए शेयरधारकों की मंजूरी अनिवार्य होती है। कंपनी की असाधारण आम बैठक (EGM) में इस ऐतिहासिक सौदे को 92.9% वोटों के भारी बहुमत के साथ मंजूरी दी गई, जो भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी में कंपनी के विश्वास को दर्शाता है।

कजाकिस्तान: दुनिया का यूरेनियम पावरहाउस

आपको बता दें कि कजाकिस्तान, जो रूस का एक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है, यूरेनियम के वैश्विक बाजार में एक बड़ी ताकत है। इसके पास दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा यूरेनियम भंडार है, जो वैश्विक कुल का लगभग 14% (अनुमानित 700,000 से 969,200 टन) है। साल 2009 से यह लगातार दुनिया का सबसे बड़ा यूरेनियम उत्पादक बना हुआ है और दुनिया की कुल आपूर्ति में 40% से अधिक का योगदान देता है। यहां खनन मुख्य रूप से शू-सारिसू और सिरदरिया क्षेत्रों में केंद्रित है, जहां लागत-प्रभावी ‘इन-सीटू रिकवरी’ (ISR) विधियों का उपयोग किया जाता है। इन सभी गतिविधियों का प्रबंधन राष्ट्रीय कंपनी ‘कजाटोमप्रोम’ द्वारा किया जाता है।

भारत के लिए इस ऐतिहासिक समझौते के क्या हैं मायने?

यह समझौता भारत के लिए कई मायनों में बेहद महत्वपूर्ण है, जो देश की ऊर्जा सुरक्षा को एक नई दिशा देगा।

  • स्थिर ईंधन आपूर्ति: भारत अपने परमाणु रिएक्टरों के लिए ईंधन के रूप में यूरेनियम के आयात पर काफी हद तक निर्भर है। यह सौदा भारत को अगले कई वर्षों तक ईंधन की एक स्थिर और विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित करेगा।
  • रणनीतिक साझेदारी को मजबूती: भारत और कजाकिस्तान के बीच पहले भी यूरेनियम आपूर्ति के समझौते हो चुके हैं, जैसे 2015-2019 के दौरान 5,000 टन यूरेनियम की आपूर्ति का समझौता। यह नया सौदा उस रणनीतिक साझेदारी को और भी गहरे स्तर पर ले जाता है।
  • विश्व के सबसे बड़े उत्पादक से सीधा सौदा: कजाटोमप्रोम दुनिया में यूरेनियम का सबसे बड़ा उत्पादक है और अनुमान है कि 2025 में वैश्विक प्राथमिक यूरेनियम उत्पादन का लगभग 20% हिस्सा इसी कंपनी का होगा। यह कजाख राष्ट्रीय परमाणु कंपनी 27 भंडारों का संचालन करती है, जिन्हें 14 खनन संपत्तियों में बांटा गया है।

गोपनीय शर्तें और वैश्विक बाजार पर असर

कजाटोमप्रोम एशिया, यूरोप और अमेरिका में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के संचालकों को विभिन्न अनुबंधों के तहत यूरेनियम की आपूर्ति करता है। हालांकि, भारत के साथ हुए इस नए समझौते के तहत आपूर्ति किए जाने वाले यूरेनियम की सटीक मात्रा, कीमत और डिलीवरी के समय-सारणी को फिलहाल सार्वजनिक नहीं किया गया है। भारत के खरीद और भंडार निदेशालय (DPS) ने व्यावसायिक संवेदनशीलता का हवाला देते हुए इन शर्तों को गोपनीय रखने का अनुरोध किया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बड़े सौदे से वैश्विक बाजार में यूरेनियम की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है, जिससे कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा अब सीधे भारत को आवंटित कर दिया गया है। इसी कारण से इस समझौते को चीन के लिए एक बड़ा झटका भी माना जा रहा है, जो खुद अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए वैश्विक यूरेनियम बाजार पर नजर रखता है।

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