होर्मुज के जाल में फंसे भारतीय जहाज दिल्ली की रणनीतिक परीक्षा का सबसे बड़ा इम्तिहान बन गए हैं

होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे 15 भारतीय जहाजों को सुरक्षित निकालना केवल एक सैन्य रेस्क्यू ऑपरेशन नहीं है बल्कि यह पश्चिम एशिया में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को बचाने की एक आखिरी कोशिश है।

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फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच का वह संकरा समुद्री रास्ता जिसे दुनिया होर्मुज जलडमरूमध्य के नाम से जानती है, आज एक बार फिर वैश्विक शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन चुका है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते सीधे टकराव ने उन 15 भारतीय जहाजों और उनके चालक दल के लिए जीवन-मरण का प्रश्न खड़ा कर दिया है जो व्यापारिक मार्ग पर अपनी सामान्य ड्यूटी पर थे। भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया ‘ऑपरेशन वापसी’ महज एक बचाव अभियान नहीं है, बल्कि यह उन हजारों भारतीय परिवारों की उम्मीदों और करोड़ों डॉलर के व्यापारिक हितों की रक्षा का संकल्प है जो इस वक्त समंदर के उस हिस्से में कैद हैं जहां युद्ध की चिंगारी कभी भी भड़क सकती है।

ईरानी नौसेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की बढ़ती सक्रियता ने इस क्षेत्र में व्यावसायिक जहाजों के लिए ‘नो-गो ज़ोन’ जैसी स्थिति पैदा कर दी है। भारतीय नौसेना के पी-8आई टोही विमान और आईएनएस चेन्नई जैसे युद्धपोत लगातार निगरानी कर रहे हैं, लेकिन कूटनीतिक गलियारों में तनाव की तपिश साफ महसूस की जा सकती है। समुद्री सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट पिछले दो दशकों में भारतीय समुद्री वाणिज्य के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है क्योंकि यह संकट केवल जहाजों के फंसने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत के ऊर्जा भविष्य पर लगा एक बड़ा प्रश्नचिह्न है।

समंदर की उस संकरी गली में छिपी है दुनिया की सबसे महंगी दुश्मनी

होर्मुज के इस भू-राजनीतिक भूगोल को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी 33 किलोमीटर चौड़े रास्ते से गुजरता है। इतिहास गवाह है कि जब भी ईरान और पश्चिम के बीच तनाव बढ़ा है, होर्मुज को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया है। 1980 के दशक के ‘टैंकर वॉर’ की यादें आज भी ताजा हैं जब इसी रास्ते पर सैकड़ों जहाजों को निशाना बनाया गया था। आज स्थिति और भी जटिल है क्योंकि अब मुकाबला केवल दो देशों के बीच नहीं, बल्कि अत्याधुनिक ड्रोन और मिसाइल तकनीक के दौर में हो रहा है जहां एक छोटी सी मानवीय भूल भी महायुद्ध का कारण बन सकती है।

इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे चलते हैं। भारत ने हमेशा से ईरान और इजरायल के साथ अपने संबंधों को एक नाजुक संतुलन पर टिकाए रखा है। एक तरफ जहां चाबहार बंदरगाह के जरिए भारत मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बनाना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ इजरायल के साथ रक्षा और तकनीक के गहरे रिश्ते हैं। मगर यह सिर्फ सतह है। जब भारतीय जहाजों को इस तनावपूर्ण क्षेत्र में रोका जाता है या उनकी आवाजाही बाधित होती है, तो यह संतुलन बुरी तरह डगमगाने लगता है। भारतीय नौसेना के एक पूर्व एडमिरल ने हाल ही में संकेत दिया था कि होर्मुज में सुरक्षा सुनिश्चित करना अब केवल गश्त लगाने से कहीं अधिक जटिल हो गया है।

रॉयटर्स और ब्लूमबर्ग की हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने के बाद कच्चे तेल की कीमतों में अनिश्चितता का माहौल है। लेकिन भारत के लिए चिंता का विषय केवल तेल नहीं है। इन 15 जहाजों पर मौजूद चालक दल के सदस्यों की सुरक्षा भारत की घरेलू राजनीति और अंतरराष्ट्रीय साख दोनों के लिए अत्यंत संवेदनशील मुद्दा है। खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय प्रवासी इस घटनाक्रम को गहरी चिंता के साथ देख रहे हैं क्योंकि उनकी आजीविका सीधे तौर पर इस समुद्री मार्ग की स्थिरता से जुड़ी हुई है।

तेल की कीमतों से आगे भारत के लिए बीमा और साख का बड़ा संकट खड़ा हो चुका है

इस पूरे घटनाक्रम का वह पहलू जिसे मुख्यधारा की मीडिया ने पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है, वह है समुद्री बीमा का बदलता गणित। जैसे ही होर्मुज में तनाव बढ़ा, अंतरराष्ट्रीय समुद्री बीमा कंपनियों ने इस क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों के लिए ‘वॉर रिस्क सurcharge’ यानी युद्ध जोखिम शुल्क में 40 से 60 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी कर दी है। भारतीय शिपिंग कंपनियों के लिए यह अतिरिक्त बोझ उनके मुनाफे को पूरी तरह खत्म कर सकता है। अगर ऑपरेशन वापसी के जरिए इन जहाजों को सुरक्षित निकाल भी लिया जाता है, तो भी लंबे समय तक इस रूट पर भारतीय जहाजों का बीमा प्रीमियम इतना अधिक रहेगा कि भारतीय निर्यात वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धी नहीं रह पाएगा।

विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि ईरान इस वक्त भारतीय जहाजों को एक ‘डिप्लोमैटिक लीवरेज’ या कूटनीतिक सौदेबाजी के औजार के रूप में देख रहा है। तेहरान यह अच्छी तरह जानता है कि नई दिल्ली के लिए उसके नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि है, और इस दबाव का इस्तेमाल वह अमेरिका और इजरायल के खिलाफ अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कर सकता है। यह भारत की उस घोषित नीति की परीक्षा है जिसमें हम खुद को ‘विश्व मित्र’ कहते हैं। क्या भारत अपनी इस छवि का इस्तेमाल कर ईरान को यह समझाने में सफल होगा कि भारतीय हितों को निशाना बनाना खुद ईरान के लिए भविष्य में रणनीतिक रूप से महंगा साबित हो सकता है?

आर्थिक नुकसान का आकलन करें तो प्रत्येक दिन की देरी भारतीय आयातकों के लिए करोड़ों रुपये का घाटा पैदा कर रही है। लॉयड्स लिस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज में फंसे जहाजों में केवल कच्चा तेल ही नहीं, बल्कि भारी मात्रा में एलएनजी और इंजीनियरिंग गुड्स भी शामिल हैं। भारत की सप्लाई चेन में आने वाली यह बाधा आने वाले महीनों में मुद्रास्फीति यानी महंगाई को नए स्तर पर ले जा सकती है। यह केवल एक रेस्क्यू मिशन नहीं है, बल्कि यह भारत की आर्थिक संप्रभुता को बचाने की एक लंबी लड़ाई की शुरुआत है जिसे आने वाले कई हफ्तों तक लड़ा जाना बाकी है।

फारस की खाड़ी का अगला मोड़ दिल्ली के लिए दो धारी तलवार साबित हो सकता है

अगले कुछ हफ्तों में इस संकट के दो मुख्य परिदृश्य उभरकर सामने आ रहे हैं। पहले परिदृश्य में, यदि भारत की कूटनीति सफल रहती है और ईरान भारतीय जहाजों को ‘सुरक्षित गलियारा’ देने पर सहमत हो जाता है, तो यह प्रधानमंत्री कार्यालय की एक बड़ी जीत मानी जाएगी। इसके लिए भारतीय विदेश मंत्रालय को तेहरान के साथ उन पुरानी कड़ियों को फिर से जोड़ना होगा जो पिछले कुछ समय में इजरायल के प्रति बढ़ते झुकाव के कारण कमजोर पड़ी हैं। यह रास्ता कठिन है क्योंकि इसमें अमेरिका की नाराजगी मोल लेने का जोखिम भी शामिल है।

दूसरे परिदृश्य में, यदि तनाव और बढ़ता है और होर्मुज पूरी तरह से बंद हो जाता है, तो भारत को ‘ऑपरेशन संकल्प’ के दायरे को व्यापक करते हुए अपनी नौसेना को और अधिक आक्रामक भूमिका में उतारना पड़ सकता है। इसका मतलब होगा कि भारतीय युद्धपोत न केवल निगरानी करेंगे, बल्कि भारतीय व्यापारिक जहाजों को सशस्त्र सुरक्षा के घेरे में लेकर इस क्षेत्र से बाहर निकालेंगे। यह कदम भारत को प्रत्यक्ष रूप से इस क्षेत्रीय संघर्ष का हिस्सा बना सकता है, जिससे अब तक भारत बचने की कोशिश करता रहा है। सैन्य भाषा में इसे ‘एस्कॉर्ट मिशन’ कहा जाता है और इसमें दुश्मन के ड्रोन या मिसाइल हमले की चपेट में आने का खतरा हमेशा बना रहता है।

एक तीसरा और सबसे डरावना परिदृश्य यह है कि यह संकट हफ्तों तक खिंच जाए और फंसे हुए भारतीय जहाजों को ‘फ्लोटिंग प्रिज़न’ यानी तैरते हुए जेलखानों में बदल दिया जाए। ऐसी स्थिति में भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ेगा कि वह इजरायल के खिलाफ सख्त रुख अपनाए। यह दिल्ली के लिए वह रणनीतिक दुःस्वप्न होगा जहां उसे अपने दो सबसे करीबी सहयोगियों में से किसी एक को चुनना पड़ेगा। सुरक्षा विश्लेषक मानते हैं कि भारतीय नौसेना की क्षमता पर संदेह नहीं है, लेकिन इस युद्धग्रस्त समुद्र में राजनीति की लहरें किसी भी सैन्य अभियान से कहीं अधिक तेज और घातक हैं।

सुरक्षित वापसी और एक बदलते भू-राजनीतिक युग की कड़वी हकीकत

होर्मुज की लहरों के बीच फंसा हुआ हर भारतीय जहाज आज उस बदलती दुनिया का प्रतीक है जहां पुराने नियम अब काम नहीं कर रहे हैं। जिस ‘नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ की दुहाई दी जाती रही है, वह पश्चिम एशिया के इस संकरे रास्ते में दम तोड़ती नजर आ रही है। ऑपरेशन वापसी की सफलता केवल 15 जहाजों के किनारे लगने से तय नहीं होगी, बल्कि इस बात से तय होगी कि क्या भारत भविष्य में अपने समुद्री हितों की रक्षा के लिए किसी क्षेत्रीय शक्ति के भरोसे रहने के बजाय अपनी स्वतंत्र सुरक्षा गारंटी स्थापित कर पाता है।

सच्चाई यह है कि समंदर के इस हिस्से में शांति अब एक दुर्लभ वस्तु बन चुकी है। भारत को यह समझना होगा कि केवल नौसेना की ताकत और कूटनीति की मिठास काफी नहीं है, बल्कि उसे अपनी ऊर्जा निर्भरता और व्यापारिक मार्गों का विविधीकरण करने की तत्काल आवश्यकता है। जब तक भारत का 20 प्रतिशत तेल एक ही संकरी गली से आता रहेगा, तब तक हमारी रणनीतिक स्वायत्तता होर्मुज के किसी भी तनाव का बंधक बनी रहेगी। यह संकट एक चेतावनी है कि जो दांव आज लगाया गया है, उसकी असली कीमत केवल सुरक्षा में नहीं, बल्कि हमारी भविष्य की रणनीतिक आत्मनिर्भरता में छिपी है।

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