अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह आक्रामक बयान अपने आप में बहुत कुछ बयां करता है, जिसमें उन्होंने दावा किया है कि “ईरान की सेना तबाह हो चुकी है और उनकी पूरी नेवी पानी के नीचे है।” कूटनीतिक बयानों के आवरण को हटा दें तो यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि सोमवार सुबह 10 बजे (ईस्टर्न टाइम) से होर्मुज स्ट्रेट में लागू होने वाली नाकेबंदी कोई सामान्य समुद्री गश्त या सैन्य अभ्यास नहीं है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने जिस तरह से ईरानी बंदरगाहों की ओर जाने वाले सभी जहाजों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का फरमान जारी किया है, वह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के सबसे कठोर और आक्रामक समुद्री अवरोधों में से एक माना जाएगा।
अब सवाल यह उठता है कि क्या यह अभूतपूर्व कदम सिर्फ ईरान की सैन्य और आर्थिक कमर तोड़ने के लिए उठाया गया है। अमेरिकी प्रशासन इसे समुद्री सुरक्षा और क्षेत्र में ‘गैर-कानूनी टोल’ वसूली को रोकने के एक अत्यंत आवश्यक उपाय के रूप में पेश कर रहा है। व्यापारिक जहाजों के नेविगेशन के लिए जारी किए गए विशेष दिशानिर्देश और उन्हें ‘ब्रिज-टू-ब्रिज चैनल 16’ के माध्यम से लगातार अमेरिकी नौसेना के संपर्क में रहने के जो निर्देश दिए गए हैं, वे दिखाते हैं कि अमेरिका अब इस समूचे क्षेत्र का स्वयंभू ट्रैफिक कंट्रोलर बन चुका है।
मगर यह सिर्फ सतह पर दिखने वाला एक छलावा है जिसे दुनिया के सामने परोसा जा रहा है। रणनीतिक मामलों के गंभीर विश्लेषक जानते हैं कि अरब खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच के इस संकरे समुद्री रास्ते से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल हर दिन गुजरता है। इस अत्यंत महत्वपूर्ण जलमार्ग पर किसी एक महाशक्ति का सीधा एकाधिकार केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर भारत और चीन जैसे उन देशों की संप्रभुता और अर्थव्यवस्था को चुनौती है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर पूरी तरह निर्भर हैं।
एक सदी पुरानी जलसंधि और ‘टोल’ के बहाने शुरू हुआ नया शक्ति प्रदर्शन
होर्मुज जलडमरूमध्य का इतिहास हमेशा से महाशक्तियों के आपसी टकराव का गवाह रहा है, लेकिन मौजूदा संकट की नींव एक बहुत ही सोची-समझी भू-राजनीतिक रणनीति के तहत रखी गई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने जब अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर यह खुली चेतावनी दी कि “जो कोई भी गैर-कानूनी टोल देगा, उसे खुले समुद्र में सुरक्षित रास्ता नहीं मिलेगा,” तो उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका अब केवल निगरानी तंत्र तक सीमित नहीं रहेगा। यह नाकेबंदी सीधे तौर पर ईरानी बंदरगाहों से जुड़े व्यापारिक मार्गों को अवरुद्ध करने का एक ऐसा भौतिक प्रयास है, जिसका सीधा असर उन सभी देशों पर पड़ेगा जो ईरान से किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष व्यापारिक संबंध बनाए रखना चाहते हैं।
इस खतरनाक फैसले के पीछे का घटनाक्रम रातों-रात तैयार नहीं हुआ है, बल्कि यह ईरान को घेरने की एक लंबी प्रक्रिया का चरम बिंदु है। वाशिंगटन लगातार यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है कि ईरान अपने समुद्री प्रभाव का जरा भी विस्तार न कर सके। CENTCOM द्वारा ‘नोटिस टू मैरिनर्स’ जारी करना और यह स्पष्टीकरण देना कि गैर-ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों को इस नाकेबंदी से पूरी तरह छूट मिलेगी, एक बेहद चालाकी भरी कूटनीतिक चाल है ताकि यूरोपीय और अन्य सहयोगी देशों को फिलहाल शांत रखा जा सके। यह विभाजनकारी रणनीति स्पष्ट रूप से ईरान को अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से पूरी तरह अलग-थलग करने के लिए रची गई है।
लेकिन असली कहानी यहीं से शुरू होती है, जहां कूटनीति खत्म होकर सैन्य ताकत का नंगा प्रदर्शन शुरू होता है। बारूदी सुरंगों को हटाने और सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित करने के नाम पर अमेरिकी नेवी की इस अभूतपूर्व तैनाती ने खाड़ी क्षेत्र में एक अघोषित युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी है। ओमान की खाड़ी में तैनात अमेरिकी जंगी जहाजों की आक्रामक गश्त अब केवल सुरक्षा का विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह इस बात का अकाट्य संकेत है कि वाशिंगटन किसी भी कीमत पर तेहरान को उसके ही घर में घेरकर आत्मसमर्पण के लिए मजबूर करना चाहता है।
असली निशाना तेहरान नहीं, बल्कि बीजिंग का ‘डार्क फ्लीट’ है
मुख्यधारा की मीडिया और पश्चिमी थिंक टैंक इस पूरी नाकेबंदी को ईरान और अमेरिका के बीच के सीधे सैन्य टकराव के रूप में प्रचारित कर रहे हैं, लेकिन यह इस पूरे घटनाक्रम के विश्लेषण का सबसे सतही और कमजोर पहलू है। जो सबसे बड़ा रणनीतिक तथ्य पूरी तरह से अनदेखा किया जा रहा है, वह यह है कि आज ईरान की डूबती अर्थव्यवस्था को कोई पश्चिमी देश नहीं, बल्कि बीजिंग का वह ‘डार्क फ्लीट’ (अवैध व्यापार करने वाले जहाजों का समूह) चला रहा है, जो ग्लोबल राडार से बचकर और अपनी पहचान छिपाकर ईरानी कच्चे तेल की लगातार तस्करी करता है। जब अमेरिकी नौसेना इन तेल ले जाने वाले जहाजों को रोकने के लिए बल प्रयोग करेगी, तो उनका सामना ईरानी नौसेना से नहीं, बल्कि सीधे तौर पर चीनी वाणिज्यिक और रणनीतिक हितों से होगा।
इस नाकेबंदी का सीधा मतलब यह है कि अमेरिकी युद्धपोत अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से चल रहे व्यापारिक जहाजों को जबरन रोकेंगे, उनकी तलाशी लेंगे और संदेहास्पद पाए जाने पर उन्हें जब्त करेंगे। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून (UNCLOS) के तहत, युद्ध की आधिकारिक घोषणा के बिना तटस्थ जहाजों के साथ ऐसा व्यवहार करना स्पष्ट रूप से युद्ध का कृत्य (Act of War) माना जाता है। यदि कोई भी चीनी या एशियाई जहाज इस मनमाने अमेरिकी आदेश को मानने से इनकार करता है, तो क्या अमेरिकी नौसेना उस पर सीधा हमला करेगी? यह वह सबसे ज्वलंत सवाल है जिसे वाशिंगटन फिलहाल नजरअंदाज कर रहा है, लेकिन इसका एक भी गलत जवाब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है।
आर्थिक मोर्चे पर इसके भयानक झटके अभी से पूरी दुनिया में महसूस किए जाने लगे हैं और इसका दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। भले ही भारत जैसे मित्र देशों के लिए यह स्पष्ट रूप से कहा गया हो कि दूसरे बंदरगाहों वाले जहाजों को छूट मिलेगी, लेकिन इस तनावपूर्ण क्षेत्र से गुजरने वाले हर जहाज का समुद्री बीमा प्रीमियम रातों-रात आसमान छूने लगेगा। जब दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्ग को एक सक्रिय संघर्ष क्षेत्र और सैन्य नाकेबंदी के अधीन घोषित कर दिया गया हो, तो कोई भी शिपिंग कंपनी अपनी मर्जी से सामान्य दरों पर अपने कार्गो को वहां से गुजारने का भारी जोखिम नहीं लेगी, जिसका सीधा असर मालभाड़े में अप्रत्याशित वृद्धि के रूप में सामने आएगा।
रणनीतिक तौर पर यह अमेरिका द्वारा चीन के लिए बिछाया गया एक बेहद जटिल और खतरनाक जाल है जिसे भेदना बीजिंग के लिए आसान नहीं होगा। यदि बीजिंग अपने ऊर्जा जहाजों की सुरक्षा के लिए अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी (PLAN) को होर्मुज में तैनात करता है, तो यह प्रशांत महासागर से बाहर चीनी नौसेना का सबसे बड़ा और सीधा अमेरिकी सामना होगा जो तीसरे विश्व युद्ध की आहट दे सकता है। और इसके विपरीत, यदि चीन खामोश रहता है और अपने जहाजों को लुटने देता है, तो उसे अपने सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं में से एक को हमेशा के लिए खोना पड़ेगा, जो उसकी उभरती हुई वैश्विक महाशक्ति की छवि को ऐसा करारा झटका देगा जिससे उबरना नामुमकिन होगा।
तीन परिदृश्य, और तीनों ले जाते हैं एक अपरिहार्य वैश्विक आर्थिक संकट की ओर
भविष्य की ओर देखें तो इस नाकेबंदी से उत्पन्न होने वाले परिणाम किसी भी लिहाज से शांति और स्थिरता की ओर नहीं जाते। पहला और सबसे संभावित परिदृश्य यह है कि ईरान, जिसकी पारंपरिक नौसेना को राष्ट्रपति ट्रंप पहले ही ‘पानी के नीचे’ बता रहे हैं, सीधे टकराव के बजाय ‘असममित युद्ध’ (Asymmetric warfare) का सहारा लेगा। ईरानी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) सीधे युद्धपोतों से लड़ने के बजाय आत्मघाती ड्रोन स्वार्म, अत्याधुनिक समुद्री खदानों और फास्ट-अटैक क्राफ्ट का आक्रामक इस्तेमाल कर सकते हैं। इस भयावह स्थिति में होर्मुज से गुजरने वाला हर पश्चिमी व्यापारिक जहाज एक आसान और वैध निशाना बन जाएगा, जिससे कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल के ऐतिहासिक स्तर को भी पार कर सकती हैं।
दूसरा परिदृश्य कूटनीतिक ध्रुवीकरण और सैन्य गठजोड़ के एक नए युग की शुरुआत का है जो शीत युद्ध से भी अधिक जटिल होगा। यदि अमेरिकी नौसेना की यह नाकेबंदी बहुत अधिक आक्रामक हो जाती है और नागरिक जहाजों का नुकसान होता है, तो चीन और रूस अपने रणनीतिक हितों को बचाने के लिए संयुक्त रूप से ईरान के प्रत्यक्ष समर्थन में उतर सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इस एकतरफा नाकेबंदी को लेकर भले ही वीटो का खेल चले, लेकिन उससे भी ज्यादा खतरनाक यह होगा कि ये यूरेशियन शक्तियां अपनी व्यापारिक लाइनों को सुरक्षित करने के लिए खाड़ी में अपने जंगी जहाजों का सीधा एस्कॉर्ट मिशन शुरू कर दें। यह एक छोटी सी सामरिक गलतफहमी को महाशक्तियों के बीच एक पूर्ण पैमाने के विनाशकारी युद्ध में बदल सकता है।
तीसरा परिदृश्य पूरी तरह से वैश्विक आर्थिक पंगुता का है जिसमें बिना कोई बड़ा युद्ध लड़े ही आधी दुनिया मंदी में डूब जाएगी। भले ही होर्मुज में एक भी नई गोली न चले, लेकिन नाकेबंदी के कारण पैदा हुई भयंकर अनिश्चितता और सप्लाई चेन का टूटना वैश्विक ऊर्जा तंत्र को लकवा मार देगा। भारत, जो अपनी ऊर्जा का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आयात करता है, उसे पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी उछाल के साथ-साथ मुद्रास्फीति के एक ऐसे चक्र का सामना करना पड़ेगा जो नीति निर्माताओं के नियंत्रण से बाहर होगा। इस प्रकार, यह नाकेबंदी विकासशील देशों की उभरती अर्थव्यवस्थाओं को एक बार फिर गहरी मंदी की चपेट में धकेल देगी।
अहंकार का खेल और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यवस्था का अंत
यह अमेरिकी नाकेबंदी महज ईरान जैसे एक अक्खड़ देश को सबक सिखाने की सामान्य सैन्य कवायद नहीं है, बल्कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी उस नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था के ताबूत में आखिरी कील है, जो ‘फ्रीडम ऑफ नेविगेशन’ (नौवहन की स्वतंत्रता) के सार्वभौमिक सिद्धांत पर मजबूती से टिकी थी। वाशिंगटन ने अपने बेतहाशा सैन्य बाहुबल के दम पर यह साबित करने की कोशिश की है कि अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों के नियम वही तय करेगा और जरूरत पड़ने पर उन्हें कुचल भी देगा। लेकिन यह एकतरफा शक्ति प्रदर्शन उसकी रणनीतिक दूरदर्शिता को नहीं, बल्कि उसके भू-राजनीतिक अहंकार और एक मरते हुए एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था की हताशा को दर्शाता है।
जो दांव डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने खाड़ी के इस उबलते पानी में लगाया है, उसकी असली कीमत न तो तेहरान के सत्ता प्रतिष्ठान चुकाएंगे और न ही वाशिंगटन के नीति निर्माता। इस अहंकार के खेल की सबसे भारी कीमत वैश्विक दक्षिण (Global South) के उन करोड़ों आम नागरिकों को चुकानी होगी, जिनकी अर्थव्यवस्थाएं इन महाशक्तियों की वर्चस्व की अंधी लड़ाई के कारण ईंधन की महंगाई और भयंकर अस्थिरता की आग में झोंक दी जाएंगी। होर्मुज का यह अभूतपूर्व संकट अब किसी एक शासन के पतन या एक चुनाव जीतने की संकीर्ण रणनीति से बहुत आगे निकल चुका है; यह इतिहास का वह निर्णायक क्षण है जो यह तय करेगा कि भविष्य की दुनिया बहुध्रुवीय सह-अस्तित्व पर आधारित होगी या फिर किसी एक नौसेना की बंदूकों के खौफनाक साये में चलेगी।





















