भारत की विदेश नीति
इजरायली विश्लेषक शे गैल ने लिखा है कि भारत को मध्यस्थ के तौर पर खुद को पेश करने की जरूरत नहीं थी। उन्होंने कहा है कि भारत ने किसी भी पक्ष से अपने संपर्क नहीं तोड़े और वाशिंगटन, यरुशलम, रियाद, अबू धाबी, मॉस्को और तेहरान सभी के साथ अपना काम जारी रखा। शे गैल ने लिखा है कि भारत किसी का प्यार पाने की कोशिश नहीं कर रहा है, बल्कि वह खुद को इतना जरूरी बना रहा है कि उसके बिना काम ही न चले।
भारत की स्थिति
शे गैल ने लिखा है कि भारत अब सिर्फ एक और अहम खिलाड़ी भर नहीं रह गया है। यह संपर्क का वह एकमात्र बिंदु है जो इस उथल-पुथल में भी आग की चपेट में आने से बचा रहा। उन्होंने कहा है कि जो कोई भी भारत की विदेश नीति को पश्चिमी नजरिए से समझने की कोशिश करता है, वह असल बात समझ ही नहीं पाता। दिल्ली को रूस से तेल खरीदने और अमेरिका के साथ सुरक्षा सहयोग बनाए रखने में कोई विरोधाभास नजर नहीं आता। उसे इजरायल के साथ साझेदारी करने और साथ ही ईरान के चाबहार में अपनी मौजूदगी बनाए रखने में कोई दिक्कत नहीं दिखती।
खाड़ी देशों के साथ संबंध
इजरायली विश्लेषक ने लिखा है कि खाड़ी देश इस बात को बहुत अच्छी तरह समझते हैं। सऊदी अरब और अमीरात के लिए भारत महज एक साझीदार नहीं है। यह एक तरह का ‘बीमा’ है। यह एक ग्राहक है एक आपूर्तिकर्ता है निवेश का साझीदार है एक श्रम शक्ति है और सुरक्षा के क्षेत्र में एक अहम भूमिका निभाने वाला देश है। उन्होंने लिखा है कि यह रिश्ता एकतरफा नहीं है। यह आपसी निर्भरता पर आधारित है। यही वजह है कि जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य में कोई हलचल होती है तो दिल्ली किसी बाहरी देश की तरह प्रतिक्रिया नहीं देता। वह इस तरह प्रतिक्रिया देता है मानो यह उसके अपने ही आंतरिक तंत्र का एक हिस्सा हो।
यह लेख भारत की विदेश नीति की तारीफ करता है और बताता है कि कैसे भारत ने खुद को मध्यस्थ के तौर पर पेश नहीं किया और किसी भी पक्ष से अपने संपर्क नहीं तोड़े। यह लेख यह भी बताता है कि भारत की स्थिति अब सिर्फ एक और अहम खिलाड़ी भर नहीं रह गई है, बल्कि यह संपर्क का वह एकमात्र बिंदु है जो इस उथल-पुथल में भी आग की चपेट में आने से बचा रहा। यह लेख खाड़ी देशों के साथ भारत के संबंधों पर भी प्रकाश डालता है और बताता है कि यह रिश्ता एकतरफा नहीं है, बल्कि यह आपसी निर्भरता पर आधारित है।
