सीजफायर के बाद कीमतों में कितनी आई गिरावट?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब 8 अप्रैल को ईरान के साथ चल रहे युद्ध में सीजफायर का ऐलान किया, तो दुनिया भर में एक उम्मीद जगी कि ऊर्जा संकट अब समाप्त हो जाएगा। इस घोषणा के तुरंत बाद वैश्विक ऊर्जा कीमतों में भारी गिरावट भी देखने को मिली। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें, जो युद्ध के दौरान 110-120 डॉलर प्रति बैरल के उच्च स्तर पर पहुंच गई थीं, सीजफायर की खबर आते ही लगभग 15-16 प्रतिशत गिरकर 93.73 डॉलर प्रति बैरल पर आ गईं।
इसी तरह, वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड की कीमतों में भी लगभग 18 डॉलर की गिरावट दर्ज की गई और यह 94.52 डॉलर तक पहुंच गया। नेचुरल गैस फ्यूचर्स में भी करीब 5 प्रतिशत की कमी आई है। हालांकि, यह गिरावट अभी भी युद्ध से पहले के स्तरों तक नहीं पहुंची है। भारत में इसका असर फिलहाल आंशिक रूप से ही दिख रहा है, जहां कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में मामूली कमी की गई है, लेकिन घरेलू उपयोग वाले सब्सिडी वाले सिलेंडर की कीमतों में कोई बदलाव नहीं हुआ है क्योंकि आयात अभी तक सामान्य नहीं हो पाया है।
तो फिर तेल और गैस तत्काल सस्ते क्यों नहीं होंगे?
यह सोचना गलत होगा कि होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने से तेल और गैस तुरंत सस्ते हो जाएंगे और उनकी किल्लत खत्म हो जाएगी। यह सिर्फ एक शुरुआती राहत है, पूर्ण समाधान नहीं। यूएस एनर्जी इन्फॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) की रिपोर्ट्स स्पष्ट रूप से बताती हैं कि ईंधन की कीमतें आने वाले कई महीनों तक ऊंची बनी रह सकती हैं। इसका मुख्य कारण युद्ध के दौरान ऊर्जा सप्लाई चेन का पूरी तरह से बाधित हो जाना है, जिसे बहाल करने में काफी समय लगेगा।
युद्ध ने फारस की खाड़ी में स्थित तेल और गैस के कुओं, रिफाइनरियों और स्टोरेज प्लांट्स को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचाया है। विशेष रूप से कतर का रास लाफान नेचुरल गैस हब बुरी तरह प्रभावित हुआ है, जो अकेले दुनिया की 20 प्रतिशत एलएनजी (LNG) का उत्पादन करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज का खुलना संकट को हल करने की दिशा में ‘पहला कदम’ मात्र है, लेकिन पूरे पर्शियन गल्फ के ऊर्जा सिस्टम को सामान्य होने में महीनों लग जाएंगे। भारत अपनी एलपीजी की 60 प्रतिशत जरूरत मध्य पूर्व से पूरी करता है, इसलिए यहां किल्लत बनी रहेगी। दिल्ली जैसे शहरों में ब्लैक मार्केट सक्रिय है और गैस सिलेंडर की डिलीवरी में 25-30 दिनों की देरी हो रही है।
युद्ध ने ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर को कैसे किया तबाह?
होर्मुज के खुलने के बाद भी समस्याएं इसलिए बनी रहेंगी क्योंकि युद्ध ने सिर्फ एक समुद्री रास्ता ही बंद नहीं किया था, बल्कि पूरे ऊर्जा बुनियादी ढांचे को तहस-नहस कर दिया है। तेल और गैस के कुओं, पाइपलाइनों, रिफाइनरियों और स्टोरेज सुविधाओं को भारी क्षति पहुंची है। हजारों तेल टैंकर समुद्र में फंसे हुए हैं, इन प्लांट्स में काम करने वाले कर्मचारी बिखर गए हैं और मरम्मत का काम अभी शुरू होना बाकी है।
EIA ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा है कि ‘पूर्ण बहाली में महीनों लगेंगे’ क्योंकि उत्पादन को फिर से शुरू करने, क्षतिग्रस्त संयंत्रों की मरम्मत करने और अटके हुए टैंकरों के बैकलॉग को खत्म करने में लंबा समय लगता है। रास लाफान हब की 17 प्रतिशत उत्पादन क्षमता अभी भी ठप है और इसकी मरम्मत में सालों लग सकते हैं। भारत जैसे आयातक देशों के लिए यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि हमारी 90 प्रतिशत सप्लाई इसी रास्ते से होती है। अमेरिका और रूस जैसे वैकल्पिक स्रोत अभी इतनी बड़ी मात्रा में सप्लाई करने के लिए तैयार नहीं हैं।
आखिर कब तक सामान्य होगी स्थिति?
विशेषज्ञों का अनुमान है कि गैस और तेल की सप्लाई को सामान्य होने में कई महीने लग सकते हैं। कुछ उत्पादन हफ्तों में शुरू हो सकता है, लेकिन पूरी सप्लाई चेन और उत्पादन के स्तर को युद्ध से पहले की स्थिति में लौटने में कम से कम 3 से 6 महीने या उससे भी अधिक का समय लग सकता है।
EIA की रिपोर्ट के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते को पूरी तरह से सुचारू होने में महीनों का वक्त लगेगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, लगभग 170 मिलियन बैरल तेल जो टैंकरों में फंसा हुआ है, उसे सिर्फ एशिया की रिफाइनरियों तक पहुंचाने में ही 6 सप्ताह लग सकते हैं। कतर और यूएई के कुछ प्लांट्स की मरम्मत में इससे भी ज्यादा समय लगने की आशंका है। भारत में एलपीजी की स्थिति तभी पूरी तरह सामान्य हो पाएगी, जब यह वैश्विक प्रवाह बहाल होगा। फिलहाल, सरकार वैकल्पिक आयात मार्गों और घरेलू उत्पादन को बढ़ाने पर काम कर रही है, लेकिन असली राहत के लिए अभी लंबा इंतजार करना पड़ेगा।
